करीब 7 करोड़ मतदाताओं वाले इस राज्य में बड़ी संख्या ऐसे युवाओं की है, जो पहली या दूसरी बार वोट डालेंगे। यही वजह है कि ममता बनर्जी की अगुवाई वाली TMC और बीजेपी दोनों ही पार्टियां युवाओं को साधने के लिए नई रणनीति पर काम कर रही हैं।
ममता का ‘युवा कार्ड’
टीएमसी ने इस बार टिकट वितरण में बड़ा बदलाव करते हुए कई पुराने चेहरों की जगह युवाओं को मौका दिया है। पार्टी ने उम्रदराज नेताओं की हिस्सेदारी घटाकर नई पीढ़ी को आगे लाने की कोशिश की है। इसके साथ ही ममता सरकार ने ‘युवा साथी’ जैसी योजनाओं का ऐलान कर युवाओं को सीधे आर्थिक मदद देने का दांव खेला है।
इस योजना के तहत 21 से 40 साल के बेरोजगार युवाओं को हर महीने 1,500 रुपये देने का वादा किया गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह रणनीति पहले से सफल रही सामाजिक योजनाओं के मॉडल को युवाओं तक विस्तार देने की कोशिश है।
बीजेपी का ‘यंग कैंडिडेट’ फॉर्मूला
दूसरी ओर, बीजेपी ने भी युवा वोटर्स को साधने के लिए अपने उम्मीदवार चयन में बड़ा बदलाव किया है। पार्टी ने बड़ी संख्या में कम उम्र के उम्मीदवारों को टिकट देकर स्पष्ट संदेश दिया है कि वह नई पीढ़ी को प्रतिनिधित्व देना चाहती है।
बीजेपी का जोर ‘रोजगार, उद्योग और पारदर्शिता’ जैसे मुद्दों पर है। पार्टी का आरोप है कि राज्य में भ्रष्टाचार और स्थानीय स्तर पर ‘कट मनी’ जैसी समस्याओं ने युवाओं के अवसर सीमित कर दिए हैं। यही कारण है कि बीजेपी ‘सोनार बांग्ला’ के नारे के साथ विकास आधारित राजनीति को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
आंकड़ों में युवा दांव
इस चुनाव में दोनों पार्टियों के फैसले साफ दिखाते हैं कि फोकस पूरी तरह युवा मतदाताओं पर है। टीएमसी ने अधिकांश उम्मीदवारों की उम्र 60 साल से कम रखी है। जबकि बीजेपी के करीब 75% से अधिक उम्मीदवार 55 साल से कम उम्र के हैं और बड़ी संख्या में उम्मीदवार 40 साल से नीचे हैं।
बीजेपी ने शिक्षकों, डॉक्टरों और वकीलों जैसे प्रोफेशनल बैकग्राउंड वाले युवाओं को भी टिकट दिया है ये आंकड़े बताते हैं कि इस बार अनुभव के साथ-साथ युवा ऊर्जा को प्राथमिकता दी जा रही है। कई सर्वे रिपोर्ट ये बतलाती हैं की बीजेपी का ग्राफ युवाओं में तेजी से बढ़ रहा हैं।

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