यूपी में "शिक्षामित्रों" के मानदेय को लेकर 1 बड़ा अपडेट

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के शिक्षामित्रों के मानदेय को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक बार फिर राज्य सरकार को सख्त निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा है कि शिक्षामित्रों के सम्मानजनक मानदेय में वृद्धि से संबंधित समिति की रिपोर्ट पर सरकार जल्द से जल्द निर्णय ले।

यह आदेश न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल की बेंच ने वाराणसी निवासी विवेकानंद की दायर अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। हालांकि अदालत ने इस याचिका को खारिज कर दिया, लेकिन साथ ही सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया कि समिति की सिफारिशों पर उचित कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

पृष्ठभूमि

शिक्षामित्रों के मानदेय में वृद्धि को लेकर पहले भी मामला कोर्ट में पहुंचा था। 12 जनवरी 2024 को हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर एक उच्चस्तरीय समिति गठित करने का आदेश दिया था ताकि शिक्षामित्रों को “सम्मानजनक मानदेय” देने के मुद्दे पर ठोस प्रस्ताव तैयार किया जा सके। समिति ने अपनी रिपोर्ट तैयार कर सरकार को सौंप दी, लेकिन उस पर कोई निर्णय न होने के कारण याचिकाकर्ता ने अवमानना याचिका दाखिल की।

याचिकाकर्ता का पक्ष

याची के अधिवक्ता सत्येंद्र चंद्र त्रिपाठी का तर्क था कि शिक्षामित्रों को अब भी बहुत कम मानदेय मिल रहा है, जो उनके जीवनयापन के लिए पर्याप्त नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें कम से कम न्यूनतम वेतन के बराबर भुगतान मिलना चाहिए।

सरकार की ओर से हलफनामा

सुनवाई के दौरान अपर मुख्य सचिव (बेसिक शिक्षा) ने कोर्ट में अनुपालन हलफनामा प्रस्तुत किया। उसमें बताया गया कि 21 अक्तूबर को समिति की बैठक हुई थी जिसमें मानदेय बढ़ाने के मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की गई। समिति ने यह माना कि मानदेय में वृद्धि का निर्णय उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है और इसके लिए कैबिनेट की स्वीकृति आवश्यक है। इसलिए रिपोर्ट उच्चाधिकारियों को भेज दी गई है।

इस सन्दर्भ में कोर्ट का क्या है रुख?

कोर्ट ने माना कि जब समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है, तो इस स्तर पर अवमानना याचिका लंबित रखने का कोई औचित्य नहीं बनता। साथ ही, अदालत ने सरकार को यह निर्देश दिया कि समिति की रिपोर्ट पर गंभीरता से विचार किया जाए और जल्द से जल्द उचित निर्णय लिया जाए ताकि शिक्षामित्रों को उनका हक मिल सके।

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