वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि वित्त वर्ष 2026 की पहली छमाही में इलेक्ट्रॉनिक्स का निर्यात पिछले साल की तुलना में 42% बढ़कर लगभग 22.2 अरब डॉलर हो गया। वहीं, पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात घटकर 30.6 अरब डॉलर रह गया। इस बढ़त के पीछे सरकार की PLI योजना और वैश्विक कंपनियों का भारत में निवेश करना प्रमुख कारण हैं।
बदलाव की शुरुआत: PLI योजना और कोविड-19
यह बदलाव अचानक नहीं हुआ। 2020 में भारत ने बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए PLI (Production Linked Incentive) योजना शुरू की। कोविड-19 ने वैश्विक सप्लाई चेन की चीन पर निर्भरता उजागर की और भारत ने इस अवसर का लाभ उठाया। PLI योजना ने उच्च मूल्य वाले मोबाइल फोन और कंपोनेंट्स के उत्पादन को प्रोत्साहित किया। इसमें Apple, Samsung जैसी दिग्गज कंपनियों को आकर्षित किया गया।
iPhone और फॉक्सकॉन का योगदान
भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में सबसे बड़ी तेजी Apple iPhone के उत्पादन के कारण आई है। वित्त वर्ष 2026 की पहली छमाही में भारत से लगभग 10 अरब डॉलर के iPhone निर्यात किए गए। Apple ने भारत को चीन के बाद अपना दूसरा सबसे बड़ा उत्पादन केंद्र बनाया है। इस परिवर्तन में ताइवान की कंपनी फॉक्सकॉन की भूमिका अहम रही है। फॉक्सकॉन ने तमिलनाडु, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश में बड़े उत्पादन केंद्र बनाए हैं। इनमें से कई यूनिट्स उच्च तकनीक वाले iPhone असेंबली और सेमीकंडक्टर OSAT प्लांट के लिए काम कर रही हैं।
भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स इकोसिस्टम मजबूत
भारत ने सिर्फ उत्पादन बढ़ाया ही नहीं बल्कि एक व्यापक इलेक्ट्रॉनिक्स इकोसिस्टम बनाने पर भी ध्यान दिया। इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स और सेमीकंडक्टर के उत्पादन के लिए कई नई योजनाएं चलाई गई हैं। इसने आयात पर निर्भरता घटाई और घरेलू मूल्य श्रृंखला को मजबूत किया। सरकार की नई पहल जैसे ECMS और SPECS योजना, भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने में मदद कर रही हैं। भारत का लक्ष्य 2030-31 तक घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन को 500 अरब डॉलर तक पहुंचाना है।
तेल से इलेक्ट्रॉनिक्स की ओर बढ़ता भारत
पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात में गिरावट और इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में वृद्धि दर्शाती है कि भारत का एक्सपोर्ट बदल रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह गति जारी रही, तो इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर आने वाले वर्षों में पेट्रोलियम को पीछे छोड़ देगा। इसके पीछे नीतिगत सहयोग, वैश्विक परिस्थितियों और वैश्विक कंपनियों का निवेश मुख्य कारण हैं। अब भारत सिर्फ सस्ता उत्पादन करने वाला देश नहीं है, बल्कि एक भरोसेमंद और दीर्घकालिक ग्लोबल विकल्प बन रहा है। इससे चीन के होश उड़ रहे हैं, क्यों की भारत धीरे-धीरे चीन की जगह ले रहा हैं।
.png)
0 comments:
Post a Comment