अमेरिका-चीन ट्रेड डील के करीब, भारत को क्या?

नई दिल्ली। अमेरिका और चीन के बीच लंबे समय से चल रहे व्यापार तनाव के बाद संकेत मिल रहे हैं कि दोनों देश बड़ी ट्रेड डील के नज़दीक हैं। हाल ही में कुआलालंपुर में हुई दो दिवसीय बातचीत में फेंटानिल दवा, शिपिंग टैक्स, सोयाबीन की खरीद और दुर्लभ खनिजों (रेयर अर्थ) पर प्रतिबंध जैसे अहम मुद्दों पर समझौते की दिशा में कदम बढ़ाए गए।

इस प्रारंभिक समझौते के बाद ट्रंप प्रशासन द्वारा चीनी सामानों पर लगाए जाने वाले टैरिफ का खतरा लगभग टल गया है, वहीं चीन ने बड़ी मात्रा में सोयाबीन खरीदने की सहमति दी है। रेयर अर्थ के निर्यात पर कड़े प्रतिबंध कम से कम एक साल के लिए स्थगित किए जाएंगे। अगर यह समझौता शी जिनपिंग और डोनाल्ड ट्रंप की आगामी मुलाकात में पक्का हो जाता है, तो अन्य विवादित मुद्दे जैसे टिकटॉक की बिक्री और बंदरगाहों पर टैक्स भी सुलझ सकते हैं।

भारत पर सकारात्मक प्रभाव

अमेरिका और चीन के बीच तनाव कम होने से वैश्विक आर्थिक स्थिरता बढ़ेगी। इसके चलते निवेश का माहौल सुधरेगा और भारत में विदेशी निवेश (एफडीआई) तथा विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआई) के बढ़ने की संभावना रहेगी।

इसके अलावा, वैश्विक आर्थिक वृद्धि का लाभ भारतीय निर्यात को भी मिलेगा। आईटी और सेवा क्षेत्रों में मांग बढ़ने की उम्मीद है क्योंकि चीन और अमेरिका दोनों की जरूरतें बढ़ेंगी। इससे भारत के व्यापारिक अवसरों में विस्तार हो सकता है और वैश्विक सप्लाई चेन में भारत की भागीदारी अधिक सशक्त हो सकती है।

भारत पर नकारात्मक या चुनौतीपूर्ण प्रभाव

हालांकि, यह समझौता भारतीय उद्योगों के लिए चुनौती भी पैदा कर सकता है। ट्रेड वॉर के दौरान कई अमेरिकी कंपनियों ने चीन से सामान खरीदने के बजाय भारत और वियतनाम जैसे देशों को चुना था। अगर अमेरिका और चीन टैरिफ कम कर देते हैं और व्यापार सामान्य हो जाता है, तो ये कंपनियां वापस चीन की ओर लौट सकती हैं। इससे भारत को मिले हुए हालिया लाभ प्रभावित हो सकते हैं।

इसके अलावा, चीन अमेरिकी वस्तुओं की अधिक खरीद करेगा, जिससे भारत के कृषि और अन्य निर्यात उत्पादों की मांग चीन में घट सकती है। व्यापक समझौते से सप्लाई चेन का पुनर्गठन धीमा हो सकता है, जिससे ‘मेक इन इंडिया’ और उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं पर असर पड़ सकता है।

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