भारत की बल्ले-बल्ले! LPG और LNG के लिए अमेरिका बना बड़ा सप्लायर, रूस अब भी तेल में नंबर-1

नई दिल्ली। भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने की रणनीति में बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है। वैश्विक तनाव और अलग-अलग देशों के बीच बढ़ते मतभेदों के बीच भारत ने कच्चे तेल और गैस की खरीद में किसी एक क्षेत्र पर निर्भर रहने के बजाय सप्लायर्स का दायरा बढ़ाया है। अगस्त 2026 के आंकड़े इस बदलती रणनीति की तस्वीर साफ करते हैं।

रूस से तेल खरीद में मामूली कमी

कच्चे तेल के मामले में रूस अब भी भारत के लिए सबसे अहम सप्लायर बना हुआ है। हालांकि, चीन की तरफ से रूसी तेल की बढ़ी मांग और मॉस्को की ओर से मिलने वाली छूट में कमी के चलते अगस्त में भारत की रूसी तेल खरीद कुछ कम हुई है। दिलचस्प बात यह है कि रूस की अपनी रिफाइनरियों पर दबाव बढ़ने के बीच भारत ने उसे पेट्रोल और डीजल की आपूर्ति करने वाले देशों में अपनी जगह मजबूत की है। यानी ऊर्जा कारोबार में दोनों देशों के बीच रिश्ता सिर्फ कच्चे तेल की खरीद तक सीमित नहीं रह गया है।

LPG में अमेरिका सबसे आगे

भारत ने रसोई गैस की आपूर्ति के लिए भी अपने स्रोतों में बड़ा बदलाव किया है। अगस्त में देश ने करीब 11 लाख टन LPG का आयात किया, जिसमें लगभग 6 लाख टन अमेरिका से आया। यानी कुल खरीद में अमेरिकी हिस्सेदारी करीब 51 फीसदी रही। इसके बाद UAE और अल्जीरिया जैसे देश प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में रहे। 

LNG में भी अमेरिका का दबदबा

तरल प्राकृतिक गैस यानी LNG के बाजार में भी अमेरिका की भूमिका तेजी से बढ़ी है। अगस्त में भारत ने लगभग 22 लाख टन LNG खरीदी, जिसमें करीब 8 लाख टन अमेरिकी आपूर्ति थी। यह कुल आयात का लगभग 38 फीसदी हिस्सा है। अमेरिका के बाद ओमान से करीब 5 लाख टन और नाइजीरिया से लगभग 4 लाख टन LNG भारत पहुंची।

सुरक्षा बढ़ी, लेकिन लागत भी बढ़ी

भारत के लिए सप्लायर बढ़ाने की रणनीति ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से फायदेमंद है। अगर किसी एक क्षेत्र में संकट पैदा होता है तो दूसरे देशों से आयात बढ़ाकर कमी को संभाला जा सकता है। हालांकि, दूर-दराज के देशों से गैस मंगाने का खर्च भी ज्यादा पड़ता है। लंबी समुद्री दूरी के कारण जहाजों का किराया, बीमा और लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ सकती है। ऐसे में भारत के सामने अब चुनौती सिर्फ पर्याप्त ऊर्जा जुटाने की नहीं, बल्कि कम लागत में सुरक्षित और लगातार सप्लाई बनाए रखने की भी है।

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