भारत ने 'Astra MK-1' मिसाइल को किया अपग्रेड

नई दिल्ली। भारत के रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) ने मिसाइल तकनीक के क्षेत्र में एक असाधारण उपलब्धि हासिल की है। स्वदेशी एयर-टू-एयर मिसाइल अस्त्र Mk-1 की मारक क्षमता को लगभग 110 किलोमीटर से बढ़ाकर 160 किलोमीटर तक कर दिया गया है। खास बात यह है कि इस उन्नयन के लिए न तो मिसाइल का इंजन बदला गया और न ही उसके बाहरी ढांचे में कोई बड़ा बदलाव किया गया।

आमतौर पर किसी एयर-टू-एयर मिसाइल की रेंज में इतनी बड़ी बढ़ोतरी को उसके नए वर्जन के रूप में देखा जाता है, लेकिन DRDO ने इसे अस्त्र Mk-2 नाम देने के बजाय मौजूदा Mk-1 प्लेटफॉर्म को ही तकनीकी रूप से कहीं ज्यादा सक्षम बना दिया है।

हार्डवेयर बदले बिना कैसे बढ़ी रेंज?

इस सफलता का राज मिसाइल के अंदर छिपी इंजीनियरिंग में है। DRDO के वैज्ञानिकों ने हार्डवेयर बदलने के बजाय केमिस्ट्री, डिजाइन और सॉफ्टवेयर पर काम किया। नतीजा यह हुआ कि करीब 45 प्रतिशत अतिरिक्त रेंज हासिल कर ली गई। इस पूरी प्रक्रिया का केंद्र रहा स्पेसिफिक इम्पल्स, जिसे आसान शब्दों में रॉकेट ईंधन की दक्षता कहा जा सकता है।

नया प्रोपेलेंट, ज्यादा ताकत

माना जा रहा है कि DRDO ने नए प्रोपेलेंट कास्टिंग तकनीक अपनाए हैं, जिससे ज्यादा घनत्व और अधिक ऊर्जा वाला ईंधन इस्तेमाल किया जा सका। इसमें उन्नत बाइंडर, आधुनिक प्लास्टिसाइजर, एल्यूमिनियम पाउडर और अमोनियम परक्लोरेट का बेहद संतुलित मिश्रण शामिल है। यह ईंधन सिर्फ तेजी से जलता नहीं, बल्कि अधिक कुशलता से ऊर्जा पैदा करता है। 

मोटर बंद होने के बाद भी उड़ान जारी

सिंगल-पल्स मिसाइलों में सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि ताकत पैदा करने का मौका सिर्फ एक बार मिलता है। DRDO ने इस चुनौती को ईंधन के आंतरिक आकार (ग्रेन डिजाइन) में बदलाव करके हल किया। पहले स्टार-शेप्ड ग्रेन का इस्तेमाल किया जाता था, जो तेज शुरुआती रफ्तार देता है लेकिन जल्दी खत्म हो जाता है। नई डिजाइन में फिन-ऑन-सिलिंडर या प्रोग्रेसिव-रिग्रेसिव ग्रेन का उपयोग किया गया है। इससे मिसाइल को शुरुआत में जोरदार धक्का मिलता है और उसके बाद लंबे समय तक नियंत्रित थ्रस्ट मिलता रहता है।

सॉफ्टवेयर और गाइडेंस की अहम भूमिका

रेंज में यह बढ़ोतरी सिर्फ सामग्री विज्ञान की उपलब्धि नहीं है, बल्कि गाइडेंस और फ्लाइट-कंट्रोल सॉफ्टवेयर का भी बड़ा योगदान है। DRDO ने मिसाइल के उड़ान मार्ग को इस तरह अनुकूलित किया है कि वह ऊंचाई का अधिकतम लाभ उठा सके। मिसाइल को एक ऊंचे आर्क में भेजा जाता है, जहां हवा कम घनी होती है और रफ्तार तेजी से नहीं गिरती। अंतिम चरण में जब मिसाइल लक्ष्य की ओर नीचे आती है, तो ऊंचाई दोबारा गति में बदल जाती है।

0 comments:

Post a Comment