बिहार सरकार का सख्त फरमान, कर्मचारी ध्यान दें!

पटना। डिजिटल युग में सोशल मीडिया आम जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। फेसबुक, एक्स (ट्विटर), इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप जैसे प्लेटफॉर्म जहां आम नागरिकों को अपनी बात रखने का मंच देते हैं, वहीं सरकारी कर्मचारियों की ऑनलाइन गतिविधियां प्रशासनिक मर्यादा और निष्पक्षता से सीधे जुड़ जाती हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए बिहार सरकार ने सरकारी सेवकों के इंटरनेट मीडिया उपयोग को लेकर सख्त और स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली, 1976 में संशोधन को मंजूरी दी गई। इस संशोधन का उद्देश्य सरकारी कर्मचारियों की ऑनलाइन गतिविधियों में जिम्मेदारी, अनुशासन और पारदर्शिता सुनिश्चित करना है।

सरकारी पहचान से सोशल मीडिया अकाउंट पर रोक

नए नियमों के तहत कोई भी सरकारी कर्मचारी अपनी सरकारी पहचान, पद या कार्यालय का उपयोग करके सोशल मीडिया अकाउंट नहीं बना सकेगा। इसके साथ ही व्यक्तिगत अकाउंट से भी ऐसी कोई पोस्ट, टिप्पणी या सामग्री साझा करना प्रतिबंधित होगा, जिससे सरकार की छवि को नुकसान पहुंचे या सरकारी नीतियों व निर्णयों पर नकारात्मक प्रभाव पड़े।

गोपनीयता और अनुशासन पर विशेष जोर

संशोधित नियमों में सरकारी गोपनीय सूचनाओं, दस्तावेजों या संवेदनशील जानकारियों को इंटरनेट मीडिया पर साझा करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है। वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ सार्वजनिक टिप्पणी करना भी अनुशासनहीनता की श्रेणी में माना जाएगा। इसके अलावा किसी न्यायालय चाहे वह सर्वोच्च न्यायालय हो या उच्च न्यायालय के फैसले या आदेश पर सोशल मीडिया के माध्यम से टिप्पणी करने की भी अनुमति नहीं होगी।

फर्जी और गुमनाम खातों पर पूरी तरह प्रतिबंध

सरकार ने स्पष्ट किया है कि कोई भी सरकारी सेवक छद्म नाम या फर्जी पहचान के जरिए सोशल मीडिया गतिविधियों में शामिल नहीं हो सकेगा। गुमनाम खातों के माध्यम से सरकारी नीतियों, अधिकारियों या संस्थानों की आलोचना को गंभीर उल्लंघन माना जाएगा। साथ ही सरकारी संगठन, राजनीतिक दल या किसी भी संस्थान के चिन्ह का उपयोग इंटरनेट मीडिया पर किसी भी रूप में करने की अनुमति नहीं होगी।

सोशल मीडिया से कमाई और लाइव प्रसारण पर रोक

नए मानकों के अनुसार सरकारी कर्मचारी इंटरनेट मीडिया के माध्यम से किसी भी प्रकार का धनार्जन नहीं कर सकेंगे। इसके अलावा सरकार की बैठकों, सुनवाई या आंतरिक प्रक्रियाओं को लाइव दिखाने पर भी पूरी तरह प्रतिबंध रहेगा। यौन उत्पीड़न या अपराध से जुड़े मामलों में पीड़ित की पहचान उजागर करना न केवल नैतिक रूप से गलत है, बल्कि अब यह स्पष्ट रूप से नियमों का उल्लंघन भी माना जाएगा।

सरकार ने यह साफ कर दिया है कि इन नियमों का उल्लंघन करने वाले कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाएगी। सरकार का तर्क है कि अनियंत्रित सोशल मीडिया गतिविधियों से प्रशासनिक अनुशासन प्रभावित होता है और जनता के बीच भ्रम की स्थिति पैदा होती है।

0 comments:

Post a Comment