मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार रूस की अग्रणी मिसाइल निर्माता कंपनी NPO माशिनोस्ट्रोयेनिया के डायरेक्टर जनरल और चीफ डिजाइनर अलेक्जेंडर लियोनोव ने मॉस्को में यह स्पष्ट कर दिया है कि ब्रह्मोस प्रोजेक्ट सिर्फ अपग्रेड नहीं, बल्कि अगली पीढ़ी की मिसाइल तकनीक की ओर बढ़ रहा है।
सुपरसोनिक से हाइपरसोनिक तक
मौजूदा ब्रह्मोस मिसाइल मैक 2.8 से अधिक की गति से उड़ान भरती है और बेहद कम ऊंचाई पर लक्ष्य को भेदने की क्षमता रखती है। यही कारण है कि आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम के लिए भी इसे रोक पाना एक बड़ी चुनौती है। अब भारत और रूस इसे मैक 5 से मैक 7 की रफ्तार तक ले जाने की दिशा में काम कर रहे हैं, जिससे यह हाइपरसोनिक हथियारों की श्रेणी में आ जाएगी।
ब्रह्मोस‑2 में क्या होगा नया?
ब्रह्मोस‑2 को पूरी तरह अगली पीढ़ी का हथियार माना जा रहा है। इसमें स्क्रैमजेट इंजन के इस्तेमाल की संभावना है। इसके अलावा इस प्रोजेक्ट में हाई‑टेम्परेचर सहने वाले नए मटीरियल, उन्नत एयरोडायनामिक डिजाइन, अत्यधिक सटीक गाइडेंस और नेविगेशन सिस्टम, लंबी रेंज, जो भविष्य में 1500 किलोमीटर तक हो सकती है। ये सभी तकनीकें दुनिया के गिने‑चुने देशों के पास ही उपलब्ध हैं, जिससे ब्रह्मोस‑2 का महत्व और बढ़ जाता है।
रूस का अनुभव, भारत की ताकत
हाइपरसोनिक हथियारों के क्षेत्र में रूस का अनुभव बेहद व्यापक है। जिरकॉन जैसी मिसाइलों के सफल विकास ने रूस को इस तकनीक में अग्रणी बना दिया है। भारत इस अनुभव का लाभ उठाकर अपने स्वदेशी रिसर्च और डेवलपमेंट को नई गति दे सकता है। यह साझेदारी सिर्फ हथियार निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के वैज्ञानिक और रक्षा उद्योग के लिए टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और विशेषज्ञता हासिल करने का भी एक बड़ा अवसर है।
चीन के लिए क्यों है यह बड़ी चुनौती?
रणनीतिक दृष्टि से ब्रह्मोस‑2 का सबसे बड़ा असर चीन पर पड़ सकता है। मौजूदा ब्रह्मोस मिसाइल को रोकने में ही चीन के एयर डिफेंस सिस्टम सक्षम नहीं हैं, जबकि हाइपरसोनिक ब्रह्मोस‑2 उसके लिए कहीं अधिक गंभीर चुनौती होगी। यह चीन के वेस्टर्न थिएटर कमांड और रॉकेट फोर्स की रणनीति के लिए एक मजबूत जवाब साबित हो सकता है। साथ ही, यह भारत को एक ऐसा डिटरेंस देगा, जिससे भविष्य में किसी भी आक्रामक कदम से पहले विरोधी को कई बार सोचना पड़ेगा।

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