आर्थिक समीक्षा में यह भी उल्लेख किया गया है कि यूरिया की खुदरा कीमत में अब तक बहुत सीमित बढ़ोतरी हुई है और मार्च 2018 से यह 45 किलो के बैग पर 242 रुपये के आसपास बनी हुई है। सस्ता यूरिया किसानों के लिए राहत तो है, लेकिन इसके दुष्परिणाम अब साफ नजर आने लगे हैं।
जरूरत से ज्यादा यूरिया बना चिंता का कारण
समीक्षा के मुताबिक, भारतीय कृषि में यूरिया यानी नाइट्रोजन का अत्यधिक इस्तेमाल हो रहा है। वर्ष 2009-10 में जहां उर्वरकों का एनपीके अनुपात 4:3.2:1 था, वहीं 2023-24 तक यह बिगड़कर 10.9:4.1:1 पर पहुंच गया है। यह असंतुलन मुख्य रूप से सस्ती नाइट्रोजन उपलब्धता के कारण पैदा हुआ है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि अधिकतर फसलों और मिट्टी के लिए 4:2:1 का अनुपात सबसे उपयुक्त होता है।
डायरेक्ट कैश ट्रांसफर का सुझाव
आर्थिक समीक्षा ने उर्वरक नीति में बुनियादी बदलाव का सुझाव दिया है। प्रस्ताव है कि सरकार तय कीमतों के जरिए सब्सिडी देने के बजाय किसानों को प्रति एकड़ के हिसाब से सीधे नकद सहायता दे। इससे किसान अपनी फसल और मिट्टी की जरूरत के अनुसार सही पोषक तत्व चुन सकेंगे। सरकार के पास पहले से आधार से जुड़ी खाद बिक्री व्यवस्था, रियल-टाइम निगरानी सिस्टम और पीएम-किसान जैसी डिजिटल योजनाएं मौजूद हैं, जिनके जरिए इस व्यवस्था को लागू करना संभव माना जा रहा है।
चरणबद्ध तरीके से लागू करने की तैयारी
आर्थिक समीक्षा में यह भी कहा गया है कि इस बदलाव को पहले कुछ कृषि क्षेत्रों में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर लागू किया जाए। इसके अनुभव के आधार पर बाद में इसे पूरे देश में विस्तार दिया जा सकता है। यदि यह प्रस्ताव अमल में आता है, तो इससे न सिर्फ किसानों को ज्यादा विकल्प और स्वतंत्रता मिलेगी, बल्कि मिट्टी की सेहत सुधरने और खेती को टिकाऊ बनाने में भी मदद मिल सकती है।

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