कर्ज में डूबी दुनिया! पहले नंबर पर कौन, भारत किस नंबर पर खड़ा?

नई दिल्ली। दुनिया इस समय रिकॉर्ड स्तर के कर्ज के दौर से गुजर रही है। जनवरी 2026 तक उपलब्ध वैश्विक आंकड़ों के अनुसार, कई बड़ी अर्थव्यवस्थाएं भारी कर्ज के दबाव में हैं। कहीं युद्ध और रक्षा खर्च वजह बने हैं, तो कहीं बढ़ती आबादी, कल्याणकारी योजनाएं और लंबे समय से चला आ रहा राजकोषीय घाटा चिंता का कारण बन रहा है।

अमेरिका बना दुनिया का सबसे बड़ा कर्जदार

कर्ज के मामले में संयुक्त राज्य अमेरिका अब भी पहले स्थान पर है। अमेरिका पर कुल सरकारी कर्ज का अनुमान करीब 38 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा लगाया जा रहा है, जो वैश्विक सार्वजनिक कर्ज का लगभग एक-तिहाई हिस्सा है। अमेरिका की अर्थव्यवस्था मजबूत जरूर है, लेकिन रिजर्व करेंसी की स्थिति, ऊंचा सैन्य बजट, सामाजिक योजनाओं पर भारी खर्च और बार-बार बजट घाटा उसे लगातार उधार लेने के लिए मजबूर कर रहा है।

चीन दुनिया का दूसरा सबसे कर्जदार देश

अमेरिका के बाद चीन दूसरे नंबर पर है। चीन का सरकारी कर्ज लगभग 18 ट्रिलियन डॉलर के आसपास आंका जा रहा है। इसकी बड़ी वजह बुनियादी ढांचे पर भारी निवेश, स्थानीय सरकारों का उधार और आर्थिक सुस्ती से निपटने के लिए किए गए प्रोत्साहन पैकेज हैं।

जापान दुनिया का तीसरा सकते कर्जदार 

तीसरे स्थान पर जापान है, जिस पर करीब 9–10 ट्रिलियन डॉलर का कर्ज है। जापान की आबादी तेजी से बूढ़ी हो रही है और लंबे समय से कम ब्याज दरों की नीति ने कर्ज को काफी बढ़ा दिया है।

कर्ज के मामले में यूरोप की क्या है स्थिति?

यूनाइटेड किंगडम पर लगभग 4 ट्रिलियन डॉलर का कर्ज हैं। जबकि फ्रांस पर करीब 3.9 ट्रिलियन डॉलर और इटली पर लगभग 3.5 ट्रिलियन डॉलर का सरकारी कर्ज है।

कर्ज के मामले में भारत की स्थिति क्या है?

कुल सरकारी कर्ज के लिहाज से भारत दुनिया में सातवें स्थान पर है। भारत का कुल कर्ज और देनदारी करीब 3.8 ट्रिलियन डॉलर के आसपास मानी जा रही है।

कर्ज-से-जीडीपी अनुपात ज्यादा मायने क्यों रखता है?

किसी देश की कर्ज चुकाने की क्षमता समझने के लिए कर्ज-से-जीडीपी अनुपात को ज्यादा अहम माना जाता है। इस पैमाने पर कुछ देश बेहद गंभीर स्थिति में हैं। उदाहरण के तौर पर, सूडान का कर्ज उसकी जीडीपी के 220 प्रतिशत से भी ज्यादा बताया जा रहा है, जो उसे सबसे अधिक दबाव वाली अर्थव्यवस्थाओं में शामिल करता है। बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में जापान का कर्ज-से-जीडीपी अनुपात करीब 237 प्रतिशत है, जो बेहद ऊंचा माना जाता है।

वहीं, इस पैमाने पर भारत का कर्ज-से-जीडीपी अनुपात लगभग 82 प्रतिशत के आसपास है। वैश्विक रैंकिंग में यह स्थिति भारत को लगभग 31वें से 35वें स्थान के बीच रखती है। सरकार का लक्ष्य है कि वर्ष 2031 तक इस अनुपात को घटाकर करीब 50 प्रतिशत के स्तर पर लाया जाए। वहीं, भारत की सबसे बड़ी मजबूती यह है कि उसका 95 प्रतिशत से अधिक कर्ज घरेलू स्रोतों से लिया गया है। इसका मतलब यह है कि विदेशी मुद्रा और बाहरी भुगतान से जुड़े जोखिम काफी कम हैं।

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