आईएनएस अरिधमन बड़ी, कम शोर वाली और लंबी दूरी की मिसाइलों से लैस है। इसकी नौसेना में तैनाती से हिंद महासागर में भारत की रणनीतिक गहराई और गुप्त संचालन की क्षमता बढ़ जाएगी। इसका मतलब यह है कि किसी भी स्थिति में भारत की जवाबी क्षमता सुनिश्चित रहेगी।
आईएनएस अरिधमन: अब तक का सबसे उन्नत संस्करण
आईएनएस अरिधमन लगभग 7,000 टन विस्थापन वाली पनडुब्बी है और इसमें आठ वर्टिकल लॉन्च ट्यूबें हैं। इसे 24 K-15 या आठ K-4 मिसाइलों के साथ ऑपरेट किया जा सकता है। भविष्य में 6,000 किलोमीटर रेंज की K-5 मिसाइलों को भी इसमें शामिल करने की योजना है। 83 मेगावाट रिएक्टर, सात ब्लेड वाला कम-शोर प्रोपेलर और उन्नत ध्वनि अवरोधक तकनीक इसे लंबी और सुरक्षित गश्त के लिए सक्षम बनाती है।
सामरिक बल और रणनीतिक महत्व
भारत का एसएसबीएन बेड़ा सामरिक बल कमान के अधीन है और उच्च-सुरक्षा नौसैनिक अड्डे से संचालित होगा। समुद्र में तैनात पनडुब्बियों का पता लगाना अत्यंत कठिन होता है, जिससे यह न्यूक्लियर ट्रायड का सबसे सुरक्षित स्तंभ बनता है। 2027-28 तक रूस की अकुला-श्रेणी की चक्र III परमाणु हमलावर पनडुब्बी भी भारतीय नौसेना में शामिल होने की उम्मीद है, जबकि प्रोजेक्ट-75I के तहत छह नई पीढ़ी की एआईपी-सक्षम डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां मझगांव डॉक में तैयार की जा रही हैं।
भारत की ताकत में होगी वृद्धि
आईएनएस अरिधमन के शामिल होने से भारत कम से कम एक पनडुब्बी को निरंतर गश्त पर तैनात रख सकेगा, जिससे किसी भी परिस्थिति में प्रभावी और गुप्त द्वितीय-प्रहार क्षमता सुनिश्चित होगी। यह भारत के न्यूक्लियर ट्रायड का सबसे सुरक्षित स्तंभ साबित होने जा रहा है और हिंद महासागर में उसकी रणनीतिक गहराई और सामरिक मजबूती को और बढ़ाएगा।

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