शौर्य NG: बैलिस्टिक और हाइपरसोनिक का मेल
शौर्य NG मिसाइल किसी भी सामान्य बैलिस्टिक मिसाइल से अलग है। यह सीधी रेखा में नहीं बल्कि प्सूडो-बैलिस्टिक मार्ग अपनाती है, जिससे दुश्मन के लिए इसे ट्रैक करना लगभग असंभव हो जाता है। इसकी रफ्तार मैक-7 से भी अधिक, यानी लगभग 8,500 किलोमीटर प्रति घंटे है। इस गति पर मिसाइल के चारों ओर अत्यधिक गर्मी और प्लाज्मा उत्पन्न होता है, जो सामान्य रडार और सिग्नल सिस्टम को बेअसर कर देता है।
मल्टी-मोड सीकर और टारगेटिंग सिस्टम
नए NG वर्जन में मल्टी-मोड सीकर तकनीक का उपयोग किया गया है, जो हाइपरसोनिक गति में भी लक्ष्य को सटीक ट्रैक करता है। DRDO ने इसे एक्टिव रडार और इमेजिंग इंफ्रारेड तकनीक के संयोजन से तैयार किया है। इसका परिणाम यह है कि मिसाइल न केवल तेज है, बल्कि हर परिस्थिति में टारगेट को पकड़ने में सक्षम है।
टर्मिनल फेज की घातक चाल
शौर्य NG की सबसे बड़ी ताकत इसका अंतिम चरण है। टारगेट पर पहुंचने से पहले आखिरी 30-60 सेकंड में मिसाइल अचानक दिशा बदलती है। इतनी तेज़ गति और अप्रत्याशित मूवमेंट के कारण दुश्मन की इंटरसेप्टर मिसाइलों के लिए इसे रोकना बेहद मुश्किल हो जाता है।
अंतरिक्ष के अंदर उड़ान
लॉन्च के बाद मिसाइल लगभग 50 किलोमीटर ऊंचाई तक जाती है, लेकिन अंतरिक्ष में नहीं बल्कि वायुमंडल के भीतर ही उड़ती रहती है। इसकी तेज़ रफ्तार और लगातार बदलती दिशा दुश्मन के लिए सही टारगेट का पता लगाना मुश्किल कर देती है।
भारत की ताकत में वृद्धि
शौर्य NG मिसाइल बैलिस्टिक मिसाइल की तेज़ गति और क्रूज मिसाइल की सटीकता का मिश्रण है। इससे न केवल भारत की स्ट्राइक क्षमता बढ़ेगी, बल्कि भविष्य में दुश्मन के खिलाफ सुरक्षा और जवाबी कार्रवाई में भी मजबूती आएगी।

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