कचरे से कमाई का मॉडल
इस योजना के तहत गोबर और अन्य जैविक कचरे का वैज्ञानिक तरीके से उपयोग किया जा रहा है। इससे बायोगैस और जैविक खाद तैयार की जाती है, जिसे स्थानीय स्तर पर उपयोग करने के साथ-साथ बेचा भी जा रहा है। अप्रैल 2023 से फरवरी 2026 के बीच पंचायतों ने जैविक खाद और अन्य उत्पादों की बिक्री से 28 लाख रुपये से ज्यादा की कमाई दर्ज की है।
ऊर्जा से चल रही गांव की मशीनें
बायोगैस से तैयार ऊर्जा का उपयोग अब गांवों में विभिन्न कार्यों के लिए किया जा रहा है। कई जगहों पर इससे आटा चक्कियां और तेल निकालने वाली मशीनें चलाई जा रही हैं। इससे न केवल बिजली की बचत हो रही है, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी बढ़ रहे हैं।
इन जिलों ने दिखाया रास्ता
कमाई के मामले में ललितपुर जिला सबसे आगे रहा है, जहां पंचायतों ने लाखों रुपये का राजस्व अर्जित किया है। इसके बाद श्रावस्ती और रामपुर जैसे जिलों ने भी इस योजना से अच्छी आय प्राप्त की है। इन जिलों का प्रदर्शन यह संकेत देता है कि अगर योजना को सही तरीके से लागू किया जाए, तो हर गांव आत्मनिर्भर बन सकता है।
पूरे प्रदेश में फैल रहा नेटवर्क
राज्य के दर्जनों जिलों में बायोगैस संयंत्र स्थापित किए जा चुके हैं। इन संयंत्रों के जरिए गोबर, रसोई के कचरे और कृषि अवशेषों को उपयोगी संसाधनों में बदला जा रहा है। किसान भी इससे तैयार जैविक खाद का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे खेती की लागत घट रही है और मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार हो रहा है।
सरकार का फोकस: आत्मनिर्भर गांव
प्रदेश सरकार का लक्ष्य गांवों को स्वच्छ और आर्थिक रूप से सक्षम बनाना है। इस दिशा में गोबरधन योजना को तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है। पंचायतों की बढ़ती आय से स्थानीय विकास कार्यों को गति मिल रही है और गांवों में बुनियादी सुविधाएं मजबूत हो रही हैं। सरकार की योजना है कि इस मॉडल को और अधिक पंचायतों तक पहुंचाया जाए, ताकि ज्यादा से ज्यादा गांव इसका लाभ उठा सकें। आने वाले समय में यह पहल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकती है।
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