मीडिया रिपोर्ट के अनुसार पंचायती राज विभाग ने शासन को प्रस्ताव भेज दिया है, जिसमें वर्तमान पंचायत प्रतिनिधियों को ही प्रशासक समिति के जरिए जिम्मेदारी सौंपने की बात कही गई है। अगर इस प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी मिलती है, तो 26 मई के बाद भी ग्राम प्रधान और अन्य पंचायत प्रतिनिधि अपनी भूमिका निभाते रहेंगे।
पंचायत चुनाव में हो सकती है देरी
राज्य में पंचायत चुनावों को लेकर इस बार कई नई प्रक्रियाएं अपनाई जा रही हैं। खासतौर पर ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया जा रहा है। आयोग को ट्रिपल टेस्ट के आधार पर आरक्षण संबंधी रिपोर्ट तैयार करनी होगी। माना जा रहा है कि इस प्रक्रिया में समय लग सकता है, जिसके कारण पंचायत चुनाव विधानसभा चुनाव 2027 के बाद कराए जाने की संभावना जताई जा रही है।
पहली बार लागू होगा ट्रिपल टेस्ट
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों में पहली बार ट्रिपल टेस्ट के आधार पर ओबीसी आरक्षण तय किया जाएगा। इससे पहले वर्ष 2021 के पंचायत चुनावों में रैपिड सर्वे के आधार पर आरक्षण लागू किया गया था। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद अब सरकार समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग गठित कर रही है, जो प्रदेशभर में जातीय और सामाजिक आंकड़ों का अध्ययन करेगा। आयोग का कार्यकाल छह महीने तय किया गया है और इसके अध्यक्ष के रूप में हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की नियुक्ति की संभावना है।
पंचायत प्रतिनिधियों को मिलेगा फायदा
यदि प्रशासक समिति के प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है, तो हजारों ग्राम प्रधानों, ब्लॉक प्रमुखों और जिला पंचायत अध्यक्षों को राहत मिलेगी। कार्यकाल बढ़ने से पंचायतों में विकास कार्यों की निरंतरता बनी रह सकेगी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सरकार पंचायत प्रतिनिधियों के साथ बेहतर समन्वय बनाए रखना चाहती है, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में उनका प्रभाव काफी अहम माना जाता है।

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