यूएन की 'World Economic Situation and Prospects 2026' रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था महामारी से पहले के स्तर पर लौटने में धीमी है। कई देशों, समुदायों और परिवारों को विकास के लाभ पूरी तरह नहीं मिल सके हैं, जिससे असमानता बढ़ रही है। रिपोर्ट के अनुसार, कमजोर अंतरराष्ट्रीय व्यापार और मौद्रिक नीति की सीमित प्रभावशीलता वैश्विक वृद्धि की गति को धीमा कर रही है।
भारत पर वैश्विक परिस्थितियों का असर
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि मजबूत घरेलू मांग भारत को अमेरिकी टैरिफ बढ़ोतरी जैसी वैश्विक चुनौतियों के प्रभाव से कुछ हद तक बचा सकती है। इससे पहले, संयुक्त राष्ट्र ने भारत की वृद्धि दर का अनुमान 7.4 प्रतिशत रखा था, जिसे अब 6.6 प्रतिशत कर दिया गया है। यह अनुमान इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) के अनुमानों के अनुरूप है, जो भारत को एकमात्र बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में दिखाता है, जिसकी वृद्धि दर 2025-26 में 6 प्रतिशत से अधिक रहने की संभावना है।
सरकारी आंकड़े बताते हैं तेज़ वृद्धि
सांख्यिकी मंत्रालय द्वारा जारी एडवांस अनुमानों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की रियल GDP वृद्धि 7.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जबकि वित्त वर्ष 2024-25 में यह 6.5 प्रतिशत रही थी। वहीं, चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर) में आर्थिक वृद्धि 8.2 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो पिछली तिमाही में 5.6 प्रतिशत थी।
ये आंकड़े दर्शाते हैं कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत घरेलू मांग, नीतिगत स्थिरता और निवेश में तेजी भारत की वृद्धि को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
वैश्विक चुनौतियां और भविष्य की दिशा
रिपोर्ट में वैश्विक स्तर पर महंगाई में कमी का संकेत दिया गया है, लेकिन बढ़ते जीवनयापन खर्च ने घरेलू बजट पर दबाव डाला है। इसके अलावा सप्लाई चेन में रुकावट और नीतिगत अनिश्चितताएं वैश्विक आर्थिक परिदृश्य को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे में भारत की स्थिर और तेज़ वृद्धि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।

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