भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की बात करें तो हाल के वर्षों में अमेरिका के ट्रेजरी बॉन्ड्स में उसका निवेश घटकर 200 अरब डॉलर से नीचे आ गया है। अक्टूबर 2025 के अंत तक यह आंकड़ा करीब 190 अरब डॉलर रहा, जो पिछले साल की तुलना में लगभग 50 अरब डॉलर कम है। हालांकि कुल विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 685 अरब डॉलर के आसपास स्थिर बना हुआ है, लेकिन इसके भीतर संरचना में बड़ा बदलाव देखने को मिला है।
सोने की ओर बढ़ता भरोसा
RBI ने जहां अमेरिकी बॉन्ड्स में निवेश कम किया है, वहीं सोने की खरीद में तेजी लाई है। अक्टूबर 2025 तक भारत के पास सोने का भंडार बढ़कर 880 मीट्रिक टन से ज्यादा हो गया, जो एक साल पहले की तुलना में स्पष्ट बढ़ोतरी दर्शाता है। कुल विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी भी बढ़कर लगभग 13.6% हो गई है, जबकि पिछले साल यह 9% के आसपास थी।
यह रुझान केवल भारत तक सीमित नहीं है। दुनिया भर के कई केंद्रीय बैंक, सोने की ऊंची कीमतों के बावजूद, अपने भंडार में इसकी हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं। आर्थिक अस्थिरता, भू-राजनीतिक तनाव और वित्तीय बाजारों में उतार-चढ़ाव के दौर में सोना अब भी एक सुरक्षित संपत्ति माना जाता है।
क्यों घट रहा है अमेरिकी ट्रेजरी में निवेश
विशेषज्ञों का मानना है कि विकसित अर्थव्यवस्थाओं में बढ़ते वित्तीय दबाव और ऊंची ब्याज दरों के कारण बॉन्ड यील्ड में उतार-चढ़ाव बढ़ गया है। इससे ट्रेजरी बॉन्ड्स में रखे गए भंडार के मूल्य में नुकसान का खतरा भी बढ़ता है। इसी जोखिम को कम करने के लिए कई केंद्रीय बैंक अपने भंडार में विविधता ला रहे हैं और डॉलर-आधारित परिसंपत्तियों पर निर्भरता घटा रहे हैं।
वहीं, रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद लगे आर्थिक प्रतिबंधों ने भी दुनिया के देशों को यह सोचने पर मजबूर किया है कि केवल डॉलर पर निर्भर रहना दीर्घकाल में सुरक्षित नहीं हो सकता। नतीजतन, सोना एक बार फिर रणनीतिक संपत्ति के रूप में उभर रहा है।
सब देश एक जैसी रणनीति पर नहीं
हालांकि सभी देश अमेरिकी ट्रेजरी से दूरी नहीं बना रहे हैं। जापान, यूनाइटेड किंगडम, बेल्जियम, फ्रांस, कनाडा और यूएई जैसे देशों ने इस अवधि में अपने निवेश को बढ़ाया है। अक्टूबर 2025 के अंत तक अमेरिकी ट्रेजरी में सबसे बड़ा निवेश जापान का रहा, जो करीब 1.2 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया। इसके उलट, चीन, भारत और ब्राजील जैसे देशों ने साल-दर-साल अपने निवेश में कटौती की है। उदाहरण के तौर पर, ब्राजील का निवेश एक साल में 228 अरब डॉलर से घटकर करीब 168 अरब डॉलर रह गया।
क्या यह डॉलर युग के अंत का संकेत है?
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि डॉलर का वर्चस्व खत्म हो रहा है। लेकिन इतना साफ है कि कई देश अपने विदेशी मुद्रा भंडार को अधिक संतुलित और सुरक्षित बनाने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स से आंशिक दूरी और सोने की ओर बढ़ता रुझान इसी बदलती वैश्विक सोच का संकेत देता है। आने वाले वर्षों में यह रणनीति वैश्विक वित्तीय व्यवस्था को किस दिशा में ले जाएगी, इस पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी।

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