इसी कड़ी में इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के हालिया बयान ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल मचा दी है। उन्होंने साफ कहा है कि इजरायल अब अमेरिका की सैन्य सहायता पर निर्भर नहीं रहना चाहता और भारत व जर्मनी के साथ मिलकर हथियारों का संयुक्त निर्माण करेगा।
अमेरिका से दूरी, भारत से नजदीकी
नेतन्याहू ने कहा कि गाजा युद्ध के दौरान कई देशों ने इजरायल को हथियार और गोला-बारूद देने से इनकार कर दिया, जिससे इजरायली सैनिकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। उन्होंने माना कि बाहरी निर्भरता किसी भी देश की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती है। इसी वजह से इजरायल अब ऐसी रक्षा नीति चाहता है, जिसमें उत्पादन, सप्लाई और तकनीक पर उसका खुद का नियंत्रण हो।
भारत के साथ रक्षा साझेदारी को लेकर नेतन्याहू ने कहा कि इससे इजरायल को तेज सप्लाई, रणनीतिक स्वतंत्रता और मजबूत गठबंधन मिलेगा। उनका लक्ष्य अमेरिका के साथ संबंधों को “सैन्य सहायता” से आगे बढ़ाकर बराबरी की साझेदारी में बदलना है।
भारत-इजरायल की पुरानी दोस्ती
भारत और इजरायल की रक्षा साझेदारी कोई नई बात नहीं है। गाजा युद्ध के दौरान जब कई देशों ने इजरायल से दूरी बना ली, तब भारत ने दोस्ती निभाई। भारत से गोला-बारूद की आपूर्ति के साथ-साथ अडानी समूह द्वारा भारत में निर्मित हर्मेस-900 ड्रोन भी इजरायल को मिले। ये ड्रोन इजरायली कंपनी एल्बिट सिस्टम्स के सहयोग से भारत में बनाए जाते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इजरायल की उन्नत रक्षा तकनीक और भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता का मेल, दोनों देशों के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है। यही वजह है कि पाकिस्तान जैसे देशों में इस बढ़ती साझेदारी को लेकर चिंता साफ दिखाई दे रही है।
अमेरिका भी भारत की ओर झुका
इजरायल के बाद अब अमेरिका ने भी भारत के साथ रक्षा सहयोग को नई ऊंचाई देने के संकेत दिए हैं। अमेरिकी कांग्रेस का एक प्रतिनिधिमंडल इन दिनों भारत के दौरे पर है, जो हथियारों के संयुक्त विकास, उत्पादन और रक्षा तकनीक साझा करने पर बातचीत करेगा।
अमेरिकी दूतावास के मुताबिक, यह दौरा भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करेगा। भारत पहले ही अमेरिका को तोप के गोले और कई रक्षा उपकरण सप्लाई कर रहा है। अब जब इजरायल और अमेरिका दोनों भारत में हथियार निर्माण को बढ़ावा दे रहे हैं, तो यह भारत की मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत नीति के लिए बड़ी सफलता मानी जा रही है।

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