इस खबर के सामने आने के बाद भारतीय शेयर बाजार में तेजी से गिरावट देखने को मिली। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर 500 प्रतिशत टैरिफ लागू होता है, तो भारत के लिए अमेरिका को निर्यात करना बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाएगा। लेकिन इसके बावजूद चीन पर अमेरिका ने नरमी बरती है।
चीन पर अमेरिका नरम क्यों?
अमेरिका और चीन के बीच लंबे समय से व्यापारिक तनाव देखने को मिलता रहा है। इसके बावजूद ट्रंप प्रशासन चीन के प्रति सावधानी बरत रहा है। इसका मुख्य कारण चीन का दुर्लभ पृथ्वी खनिजों (rare earth minerals) में दबदबा है। ये खनिज इलेक्ट्रिक वाहनों, सेमीकंडक्टर, रक्षा उपकरण और नवीकरणीय ऊर्जा तकनीक के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
चीन भले ही रूस का बड़ा तेल खरीदार है, लेकिन उस पर अमेरिका ने अतिरिक्त टैरिफ नहीं लगाया। पिछले साल 12 अगस्त को ट्रंप ने चीनी आयात पर नए शुल्क स्थगित कर दिए थे और मौजूदा टैरिफ 30% पर बनाए रखा, जबकि भारत के उत्पादों पर यह टैरिफ 50% तक है।
चीन ने दिखाया रणनीतिक दम
चीन ने अमेरिकी कंपनियों को दुर्लभ पृथ्वी तत्वों और चुम्बकों के निर्यात पर लाइसेंस प्रतिबंधों के जरिए चेतावनी दी थी। इससे अमेरिकी ऑटो और टेक्नोलॉजी क्षेत्र में आपूर्ति संकट की आशंका पैदा हो गई थी। अमेरिकी उद्योगों पर दबाव बढ़ने के कारण अमेरिका ने चीन के प्रति सख्ती अपनाने से परहेज किया।
भारत पर सख्ती क्यों?
वहीं भारत के मामले में अमेरिका ने कठोर रवैया अपनाया। भारत चीन जैसी रणनीतिक सप्लाई चेन का नियंत्रण नहीं रखता, जबकि रूस से तेल खरीदने में प्रमुख भूमिका निभा रहा है। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि भारत रूस से तेल खरीदकर यूक्रेन संकट के बीच रूसी अर्थव्यवस्था को अप्रत्यक्ष रूप से मदद कर रहा है। यही वजह है कि भारत पर अमेरिकी टैरिफ 50% तक लगाया गया और भविष्य में इसे 500% तक बढ़ाने की चेतावनी दी गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम न केवल व्यापारिक रिश्तों पर असर डालेगा बल्कि भारत के लिए अमेरिका के बाजार में निर्यात चुनौतिपूर्ण हो सकता है। वहीं चीन की रणनीतिक स्थिति और उसकी वैश्विक आपूर्ति पर दबदबे के कारण अमेरिका ने उस पर नरमी बरती है।
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