अमेरिकी ट्रेजरी में भारत की हिस्सेदारी घटी
ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, बीते एक साल में भारत ने अमेरिकी ट्रेजरी नोट्स में अपनी होल्डिंग में बड़ी कटौती की है। अक्टूबर 2024 से अक्टूबर 2025 के बीच भारत का निवेश करीब पांचवें हिस्से तक घट गया। चार साल बाद यह पहला मौका है जब अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड में भारत की सालाना हिस्सेदारी में स्पष्ट गिरावट देखने को मिली है। इससे पहले के वर्षों में भारत लगातार इन बॉन्ड्स में निवेश बढ़ा रहा था या कम से कम उसे स्थिर बनाए हुए था।
ऊंची यील्ड के बावजूद क्यों घटाया निवेश?
खास बात यह है कि यह कटौती ऐसे समय में की गई है, जब अमेरिकी बॉन्ड्स पर रिटर्न काफी आकर्षक रहा। आमतौर पर 10 साल की अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड विदेशी निवेशकों के लिए बड़ा आकर्षण होती है। इसके बावजूद भारत का पीछे हटना साफ करता है कि फैसला सिर्फ मुनाफे के आधार पर नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीति को ध्यान में रखकर लिया गया है।
बदली हुई फॉरेक्स नीति का संकेत
विशेषज्ञों के अनुसार, यह कदम भारत की फॉरेक्स नीति में बदलाव का साफ संकेत है। भारतीय रिज़र्व बैंक अब ऐसी रणनीति अपना रहा है, जिसमें जोखिम को कम करने के लिए निवेश को अलग-अलग एसेट्स और देशों में फैलाया जाए। इससे वैश्विक झटकों का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर सीमित रहेगा।
डॉलर पर निर्भरता घटाने की कोशिश
अमेरिकी ट्रेजरी में निवेश घटने का एक बड़ा कारण डॉलर की कमजोर होती स्थिति भी मानी जा रही है। हाल के महीनों में डॉलर इंडेक्स में नरमी देखने को मिली है। अमेरिका में रोजगार बाजार से जुड़े कमजोर संकेत और भविष्य में ब्याज दरों में कटौती की संभावनाएं डॉलर आधारित निवेश को लेकर अनिश्चितता बढ़ा रही हैं। ऐसे माहौल में लंबे समय के डॉलर निवेश कम आकर्षक लगने लगे हैं।
सोना और दूसरे विकल्प बने फोकस
बाजार जानकारों का मानना है कि भारत अब अपने रिज़र्व का एक हिस्सा सोने और अन्य सुरक्षित विकल्पों की ओर मोड़ रहा है। सोना एक बार फिर वैश्विक स्तर पर मजबूत रिज़र्व एसेट के रूप में उभरा है, क्योंकि यह महंगाई, मुद्रा उतार-चढ़ाव और राजनीतिक तनाव के समय सुरक्षा प्रदान करता है। इसके अलावा, अन्य देशों के सरकारी बॉन्ड और गैर-डॉलर मुद्राओं में निवेश भी भारत की नई रणनीति का हिस्सा हो सकते हैं।
वैश्विक ट्रेंड के अनुरूप बढ़ता भारत
दरअसल, भारत अकेला नहीं है। दुनिया के कई केंद्रीय बैंक इसी रास्ते पर चल रहे हैं और अपने सोने के भंडार में बढ़ोतरी कर रहे हैं। मौजूदा अनिश्चित वैश्विक माहौल में यह कदम आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए अहम माना जा रहा है।
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