कैबिनेट बैठक में कुल 30 प्रस्तावों को मंजूरी मिली, जिनमें सरकारी कर्मचारियों से जुड़ा एक अहम निर्णय भी शामिल है। नए नियमों के अनुसार अब कर्मचारियों को अपने निवेश और संपत्ति से संबंधित जानकारी अधिक पारदर्शिता के साथ देनी होगी।
1 .निवेश की जानकारी देना होगा जरूरी
सरकार के नए निर्णय के अनुसार यदि कोई सरकारी कर्मचारी एक कैलेंडर वर्ष में अपने छह महीने के मूल वेतन से अधिक राशि शेयर बाजार, स्टॉक या किसी अन्य निवेश में लगाता है, तो उसे इसकी जानकारी संबंधित प्राधिकृत अधिकारी को देनी होगी। यह नियम इसलिए लागू किया जा रहा है ताकि सरकारी कर्मचारियों के वित्तीय लेनदेन में पारदर्शिता बनी रहे और किसी भी प्रकार की अनियमितता को रोका जा सके।
2 .चल संपत्ति के लेनदेन पर भी नजर
नए नियमों के तहत यदि कोई कर्मचारी अपनी दो महीने की सैलरी से अधिक मूल्य की चल संपत्ति जैसे वाहन, सोना या अन्य कीमती सामान खरीदता या बेचता है, तो उसे इसकी सूचना भी विभाग को देनी होगी। सरकार का मानना है कि इस कदम से कर्मचारियों के बड़े वित्तीय लेनदेन पर नजर रखी जा सकेगी और भ्रष्टाचार की संभावनाएं कम होंगी।
3 .पुराने नियमों में किया गया बदलाव
पहले के नियमों के अनुसार कर्मचारियों को केवल एक महीने के मूल वेतन से अधिक की चल संपत्ति के लेनदेन की जानकारी देनी होती थी। इसके अलावा अचल संपत्ति का विवरण भी पांच साल में एक बार देना होता था। अब इस व्यवस्था में बदलाव करते हुए सरकार ने तय किया है कि कर्मचारियों को हर साल अपनी अचल संपत्ति का विवरण देना अनिवार्य होगा। इसमें जमीन, मकान या अन्य स्थायी संपत्तियां शामिल होंगी।
4 .दान में मिली संपत्ति की देनी होगी जानकारी
सरकार ने नियमों को और सख्त बनाते हुए यह भी तय किया है कि कर्मचारियों को अपने या परिवार के सदस्यों के नाम पर अर्जित संपत्ति, दान में मिली संपत्ति, पट्टे पर ली गई संपत्ति या किसी भी प्रकार के निवेश की जानकारी देना अनिवार्य होगा। इससे कर्मचारियों की कुल संपत्ति का सही रिकॉर्ड सरकार के पास उपलब्ध रहेगा।
5 .नियम का पालन नहीं करने पर होगी कार्रवाई
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि कर्मचारियों को हर साल अपनी संपत्ति का विवरण ऑनलाइन पोर्टल पर दर्ज करना होगा। यदि कोई कर्मचारी ऐसा नहीं करता है, तो उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जा सकती है। इतना ही नहीं, नियमों का पालन न करने वाले कर्मचारियों का प्रमोशन भी रोका जा सकता है। सरकार का कहना है कि इस फैसले से प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ेगी और सरकारी तंत्र में जवाबदेही मजबूत होगी।

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