ईरान-अमेरिका जंग तेज: भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर बड़ी खबर

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देने लगा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईरान और अमेरिका के बीच संघर्ष लंबे समय तक जारी रहता है तो इसका असर भारत की आर्थिक स्थिति पर भी पड़ सकता है। खासकर कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और व्यापारिक गतिविधियों में बाधा आने से आर्थिक वृद्धि प्रभावित हो सकती है।

रेटिंग एजेंसी इक्रा के रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की वास्तविक आर्थिक वृद्धि लगभग 7.1 प्रतिशत रहने का अनुमान है। यह वित्त वर्ष 2025-26 के अनुमानित 7.6 प्रतिशत की तुलना में थोड़ी कम हो सकती है। यदि पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है तो यह वृद्धि दर और भी प्रभावित हो सकती है।

समुद्री मार्गों पर बढ़ी चिंता

हाल के घटनाक्रमों के बाद पश्चिम एशिया के महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में जहाजों की आवाजाही को लेकर चिंता बढ़ गई है। यह क्षेत्र दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा परिवहन मार्गों में से एक माना जाता है। यदि यहां से तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित होती है तो दुनिया भर में ईंधन की कीमतें बढ़ सकती हैं। इससे माल ढुलाई की लागत भी बढ़ेगी और कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ सकता है।

भारत के व्यापार पर पड़ सकता है असर

पश्चिम एशिया भारत का एक बड़ा व्यापारिक साझेदार है। भारत के कुल निर्यात का लगभग 14 प्रतिशत हिस्सा इसी क्षेत्र में जाता है, जबकि आयात का लगभग 21 प्रतिशत हिस्सा भी इसी क्षेत्र से आता है। यदि इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है तो भारत के व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और परिवहन व्यवस्था पर असर पड़ सकता है। इससे आयात महंगा हो सकता है और व्यापारिक गतिविधियों में धीमापन आ सकता है।

तेल की कीमत बढ़ने से बढ़ सकता है घाटा

जानकारों के अनुसार यदि कच्चे तेल की कीमत में 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी होती है तो भारत का चालू खाते का घाटा लगभग 0.30 से 0.40 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। इसके साथ ही थोक और खुदरा स्तर पर महंगाई भी बढ़ने की संभावना रहती है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 70 से 75 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहती है तो आर्थिक स्थिति संतुलित रह सकती है। लेकिन यदि कीमतें बढ़कर 100 से 105 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाती हैं तो आर्थिक दबाव काफी बढ़ सकता है।

विदेश से आने वाली धनराशि पर भी प्रभाव

भारत में विदेशों से भेजी जाने वाली धनराशि का एक बड़ा हिस्सा पश्चिम एशियाई देशों से आता है। अनुमान के अनुसार भारत को मिलने वाली कुल विदेशी धनराशि का लगभग 40 प्रतिशत इसी क्षेत्र से आता है। यदि वहां आर्थिक गतिविधियां प्रभावित होती हैं तो भारत में आने वाली इस धनराशि पर भी असर पड़ सकता है, जिससे घरेलू अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।

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