अब तक कैबिनेट बैठकों में विभागीय सचिव योजनाओं और प्रस्तावों की जानकारी देते थे, जबकि मंत्री औपचारिक भूमिका में रहते थे। लेकिन नई व्यवस्था के तहत मंत्री खुद अपने विभागों की योजनाएं, चुनौतियां और प्रस्ताव कैबिनेट के सामने रखेंगे। सरकार का मानना है कि इससे मंत्री अपने विभागों की कार्यप्रणाली को और गहराई से समझ पाएंगे तथा फैसलों में उनकी सक्रिय भागीदारी बढ़ेगी।
नीतीश मिश्रा और श्रेयसी सिंह ने की शुरुआत
नई व्यवस्था की शुरुआत के तहत हाल ही में हुई बैठक में मंत्री नीतीश मिश्रा और श्रेयसी सिंह ने अपने विभागों का एजेंडा प्रस्तुत किया। सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी चाहते हैं कि सभी मंत्री सिर्फ राजनीतिक नेतृत्व तक सीमित न रहें, बल्कि विभागीय निर्णय प्रक्रिया में भी पूरी तरह सक्रिय भूमिका निभाएं।
अधिकारियों-मंत्रियों के बीच बढ़ेगा तालमेल
नई व्यवस्था लागू होने के बाद मंत्री पहले अपने विभागीय सचिवों और अधिकारियों के साथ विस्तृत चर्चा करेंगे। इसके बाद तैयार प्रस्ताव कैबिनेट में पेश किए जाएंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे मंत्रियों और ब्यूरोक्रेसी के बीच बेहतर संवाद स्थापित होगा। अक्सर यह शिकायत होती रही है कि कई महत्वपूर्ण फैसलों में मंत्रियों की भूमिका सीमित रह जाती है। अब सरकार इस धारणा को बदलने की कोशिश कर रही है।
फैसलों की गुणवत्ता पर रहेगा असर
सरकार का मानना है कि जब मंत्री खुद विभागीय योजनाओं को समझकर कैबिनेट में रखेंगे, तो निर्णय प्रक्रिया अधिक मजबूत और प्रभावी होगी। इससे योजनाओं के क्रियान्वयन में भी तेजी आ सकती है। जमीनी स्तर की समस्याओं की जानकारी मंत्रियों को अधिक होती है, जबकि अधिकारी प्रशासनिक प्रक्रिया संभालते हैं। ऐसे में दोनों के बेहतर तालमेल से सरकारी योजनाओं का लाभ लोगों तक तेजी से पहुंच सकता है।
जवाबदेही बढ़ाने की कोशिश
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी लगातार प्रशासनिक जवाबदेही और पारदर्शिता पर जोर दे रहे हैं। नई पहल को इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अब मंत्री अपने विभागों के कामकाज को लेकर सीधे जवाबदेह होंगे और योजनाओं की प्रगति पर अधिक निगरानी रख सकेंगे। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यदि यह व्यवस्था प्रभावी तरीके से लागू होती है तो बिहार सरकार की कार्य संस्कृति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

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