क्या है पूरा मामला?
टैरिफ व्यवस्था के अनुसार जिन घरेलू उपभोक्ताओं की पूरे वित्तीय वर्ष में बिजली की कुल खपत 1200 यूनिट तक रहती है, वे लाइफ लाइन श्रेणी में आते हैं। इस श्रेणी के उपभोक्ताओं को सामान्य उपभोक्ताओं की तुलना में कम दरों पर बिजली उपलब्ध कराई जाती है ताकि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को राहत मिल सके।
लेकिन आरोप है कि बिजली कंपनियों ने कुछ महीनों में अधिक बिजली खपत होने के आधार पर बड़ी संख्या में उपभोक्ताओं को लाइफ लाइन श्रेणी से बाहर कर दिया। इससे ऐसे उपभोक्ताओं पर भी अतिरिक्त बिजली बिल का बोझ बढ़ गया, जिनकी पूरे वर्ष की कुल खपत निर्धारित सीमा से कम है।
उपभोक्ता परिषद ने उठाया विरोध
उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद का कहना है कि नियामक आयोग के टैरिफ आदेश में स्पष्ट व्यवस्था है कि यदि किसी उपभोक्ता की पूरे वित्तीय वर्ष की बिजली खपत 1200 यूनिट से अधिक होती है, तभी उसे लाइफ लाइन श्रेणी से हटाकर सामान्य घरेलू श्रेणी में रखा जा सकता है। परिषद का तर्क है कि केवल लगातार तीन महीनों तक अधिक बिजली उपयोग होने के आधार पर किसी उपभोक्ता की श्रेणी बदलना नियमों की भावना के अनुरूप नहीं है।
गरीब उपभोक्ताओं पर बढ़ सकता है बोझ
परिषद के अनुसार कई ऐसे परिवार हैं जिनकी वार्षिक बिजली खपत 1000 यूनिट के आसपास है, लेकिन किसी विशेष मौसम या अन्य कारणों से कुछ महीनों में बिजली उपयोग बढ़ गया। ऐसे मामलों में यदि उनका विद्युत भार बढ़ाकर उन्हें दूसरी श्रेणी में डाल दिया जाता है, तो उन्हें अधिक बिल का भुगतान करना पड़ सकता है, जबकि वे पूरे वर्ष के आधार पर अब भी लाइफ लाइन श्रेणी के पात्र हैं।
लाखों उपभोक्ता हो सकते हैं प्रभावित
उपभोक्ता परिषद का दावा है कि बिजली कंपनियों ने करीब 47 लाख उपभोक्ताओं का विद्युत भार बढ़ाया है। इनमें लगभग 10 लाख ऐसे उपभोक्ता भी शामिल बताए जा रहे हैं जिनकी वार्षिक बिजली खपत 1200 यूनिट से कम है और जिन्हें लाइफ लाइन श्रेणी का लाभ मिलना चाहिए था। प्रदेश में वर्तमान समय में लगभग 1.78 करोड़ घरेलू उपभोक्ता लाइफ लाइन श्रेणी के अंतर्गत आते हैं, इसलिए इस निर्णय का प्रभाव बड़ी संख्या में परिवारों पर पड़ सकता है।

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