भारत ने क्या किया?
हालिया रिपोर्टों के मुताबिक, भारत ने बीते एक साल में अमेरिकी ट्रेजरी नोट्स में अपनी हिस्सेदारी करीब 21 फीसदी तक कम कर दी है। अक्टूबर 2024 में जहां यह निवेश 241 अरब डॉलर से अधिक था, वहीं अक्टूबर 2025 तक यह घटकर लगभग 190 अरब डॉलर रह गया। खास बात यह है कि यह कटौती ऐसे समय में की गई है, जब अमेरिकी बॉन्ड पर रिटर्न अपेक्षाकृत बेहतर माना जा रहा था। इससे साफ है कि यह फैसला केवल मुनाफे का नहीं, बल्कि रणनीतिक सोच का हिस्सा है।
डॉलर का दबदबा कमजोर
भारत का यह कदम बदलते वैश्विक हालात को भी दर्शाता है। डॉलर का वैश्विक दबदबा धीरे-धीरे कमजोर हो रहा है और अंतरराष्ट्रीय फॉरेक्स रिजर्व में उसकी हिस्सेदारी लंबे समय के निचले स्तर के आसपास पहुंच गई है। ऐसे में भारत ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार को अधिक संतुलित और सुरक्षित बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया है। अब फोकस केवल अमेरिकी डॉलर पर नहीं, बल्कि निवेश को अलग-अलग परिसंपत्तियों में फैलाने पर है।
भारत कर रहा सोना में निवेश
अमेरिकी बॉन्ड से निकली पूंजी का बड़ा हिस्सा सोने में लगाया जा रहा है। भारत का गोल्ड रिजर्व लगातार बढ़ रहा है और फॉरेक्स रिजर्व में सोने की हिस्सेदारी भी पहले से कहीं ज्यादा हो चुकी है। सोना वैश्विक अनिश्चितताओं, युद्ध और आर्थिक संकट के समय सुरक्षित निवेश माना जाता है, इसलिए यह कदम भारत की दीर्घकालिक सुरक्षा रणनीति को मजबूत करता है।
जानकार बताते हैं की भारत ने ट्रंप प्रशासन के टैरिफ दबाव का जवाब आक्रामक शब्दों से नहीं, बल्कि ठोस आर्थिक फैसलों से दिया है। यह संकेत है कि भारत अब वैश्विक मंच पर अधिक आत्मविश्वास के साथ अपनी शर्तों पर फैसले लेने को तैयार है वह भी बिना किसी टकराव के, लेकिन प्रभावी ढंग से।
.png)
0 comments:
Post a Comment