शासन की दो टूक: वेतन रोकना गलत
प्रमुख सचिव अनिल कुमार की ओर से जारी आदेश में साफ कहा गया है कि जिला पंचायतों के अधिकारियों और कर्मचारियों के नियुक्ति अधिकारी शासन है, न कि जिला पंचायत अध्यक्ष। ऐसे में अध्यक्ष स्तर से वेतन या पेंशन रोका जाना नियमों के खिलाफ है। शासन ने निर्देश दिए हैं कि भविष्य में वेतन का भुगतान तय समय पर सुनिश्चित किया जाए।
लगातार मिल रही थीं शिकायतें
लखनऊ समेत प्रदेश के कई जिलों से लगातार शिकायतें मिल रही थीं कि जिला पंचायत अध्यक्ष किसी न किसी कारण से कर्मचारियों का वेतन रोक रहे हैं। राजधानी लखनऊ में तो स्थिति यह रही कि पिछले चार महीनों से अधिकारियों और कर्मचारियों को वेतन नहीं मिला। जिला पंचायत अध्यक्ष द्वारा भुगतान फाइल आगे न बढ़ाने की शिकायत शासन तक पहुंची, जिसके बाद यह सख्त आदेश जारी किया गया।
नियमों का हवाला देकर चेतावनी
शासन ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया है कि यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ कोई आरोप या शिकायत है, तो उसकी जानकारी शासन को दी जाए। बिना अनुमति और प्रक्रिया के वेतन या पेंशन रोकना उत्तर प्रदेश जिला पंचायत एवं क्षेत्र पंचायत बजट एवं सामान्य लेखा नियमावली, 1965 का उल्लंघन है।
विकास कार्यों पर भी पड़ रहा असर
दरअसल कई जिलों में जिला पंचायत अध्यक्षों और अधिकारियों के बीच टकराव की स्थिति बनी हुई है। इसका सीधा असर विकास कार्यों पर पड़ रहा है। जिला पंचायत निधि से योजनाएं आगे नहीं बढ़ पा रहीं, जिससे आम जनता को नुकसान हो रहा है।
कर्मचारियों के लिए राहत की उम्मीद
शासन के इस आदेश के बाद अब जिला पंचायत कर्मचारियों को उम्मीद है कि उनका वेतन और पेंशन समय पर मिलेगा और उन्हें मनमानी का शिकार नहीं होना पड़ेगा। यह फैसला न केवल कर्मचारियों के हित में है, बल्कि पंचायत स्तर पर प्रशासनिक स्थिरता और विकास की रफ्तार बढ़ाने की दिशा में भी अहम माना जा रहा है।

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