क्या था मुद्दा:
प्रदेश के कई जिलों में भूमि के सहखातेदार जोत के विभाजन के लिए वाद दाखिल करने पर एसडीएम कई मामलों में इसे सुनवाई योग्य न मानकर खारिज कर देते थे। इससे नाराज भूमि मालिक अक्सर हाईकोर्ट का सहारा लेने पर मजबूर हो जाते थे। हाईकोर्ट ने इस मामले में साफ निर्देश दिया कि धारा-116 के तहत जोत के विभाजन के वादों को अंतिम निर्णय तक निपटाया जाए।
अब क्या बदलेगा:
1 .किसी भी सहखातेदार द्वारा जोत का भौतिक विभाजन कराने के लिए वाद दाखिल किया जाएगा, उसे खारिज नहीं किया जाएगा।
2 .एसडीएम सभी पक्षकारों को सुनवाई का मौका देंगे और विवादित जोत का विभाजन पूरी पारदर्शिता के साथ किया जाएगा।
3 .इस प्रक्रिया के बाद अभिलेख और मानचित्र में आवश्यक संशोधन भी कराए जाएंगे।
4 .राज्य के मंडलायुक्त और जिलाधिकारी स्तर पर इसकी समीक्षा की जाएगी ताकि सुनिश्चित किया जा सके कि एसडीएम द्वारा मामले का सही तरीके से निपटान हो रहा है।
भूमि मालिकों के लिए लाभ:
सहखातेदार जोत के विभाजन में अब देरी नहीं होगी। हाईकोर्ट के चक्कर लगाने की आवश्यकता कम होगी। भूमि से संबंधित विवादों का समाधान जल्द और पारदर्शी तरीके से होगा। भूमि के अभिलेख और मानचित्र में संशोधन समय पर संभव होगा।
इस संदर्भ में सरकारी निर्देश:
राजस्व परिषद की सचिव एवं आयुक्त कंचन वर्मा ने सभी मंडलायुक्तों और जिलाधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि सहखातेदार भूमि के विभाजन के मामलों में एसडीएम अपने फैसले में सभी पक्षकारों को सुनवाई का अवसर दें और न्यायसंगत तरीके से जोत का विभाजन सुनिश्चित करें।

0 comments:
Post a Comment