रूस नहीं, उसके साझेदार निशाने पर
ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि रूस इन देशों को तेल बेचकर यूक्रेन युद्ध के लिए संसाधन जुटा रहा है। लेकिन यह तर्क कई सवाल खड़े करता है। अगर मकसद सच में युद्ध रोकना है, तो अब तक अमेरिका और यूरोप की तमाम कूटनीतिक कोशिशें क्यों नाकाम रहीं? सच्चाई यह है कि युद्ध रोक पाने में असफल रहने के बाद अमेरिका अपनी नाकामी का बोझ दूसरे देशों पर डालना चाहता है।
तेल को लेकर अधूरा सच
रूस-यूक्रेन युद्ध कई जटिल कारणों से जुड़ा हुआ है, लेकिन ट्रंप प्रशासन इसे केवल तेल की खरीद तक सीमित करके देख रहा है। हैरानी की बात यह है कि खुद ट्रंप यह स्वीकार कर चुके हैं कि भारत ने हाल के समय में रूस से तेल आयात घटाया है। इसके बावजूद भारत को निशाने पर लेना यह दर्शाता है कि मुद्दा तेल से ज्यादा दबाव की राजनीति का है।
व्यापार वार्ता पर असर
फिलहाल भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील को लेकर बातचीत चल रही है। ऐसे समय में टैरिफ की धमकी देना भरोसे को कमजोर करता है। भारत के हित में यही होगा कि वह व्यापार और रणनीतिक साझेदारी के मुद्दे पर फोकस बनाए रखे, साथ ही यह भी साफ कर दे कि एकतरफा दबाव स्वीकार्य नहीं है।
अमेरिका की गिरती साख
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत उसकी विश्वसनीयता रही है। लेकिन ट्रंप सरकार की लगातार बदलती नीतियां, विरोधाभासी बयान और सहयोगियों पर दबाव की रणनीति उस भरोसे को कमजोर कर रही है। रूस के बहाने भारत-चीन जैसे देशों पर वार करना इसी गिरती साख का संकेत है।
.png)
0 comments:
Post a Comment