अमेरिका का अलग-थलग पड़ना
ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीतियों के कारण यूरोपीय संघ जैसे उसके प्रमुख सहयोगी भी अब उससे दूरी बनाने लगे हैं। अमेरिका ने लगभग 60 अंतरराष्ट्रीय समझौतों और संगठनों से खुद को अलग कर लिया है, जिसमें पर्यावरण, मानवाधिकार और नाटो से जुड़े समझौते शामिल हैं। इससे अमेरिका की बहुपक्षीय वैश्विक भूमिका कमजोर हुई है और सहयोगियों के साथ मिलकर चीन या अन्य वैश्विक चुनौतियों का सामना करना मुश्किल हो गया है।
दुनिया बना रही है नया रास्ता
अमेरिका और चीन के बीच महाशक्ति संघर्ष के बीच छोटे और मध्यम देशों ने किसी एक पक्ष को चुनने से बचना शुरू कर दिया है। ऐसे देश समान विचारधारा वाले देशों के साथ गठबंधन बनाकर मजबूत समूह के रूप में खड़े हो रहे हैं, जिससे वे किसी महाशक्ति के दबाव में नहीं रहेंगे। यह बहुपक्षीय दृष्टिकोण वैश्विक शक्ति संरचना को बदल रहा है।
भारत ने उठाया रणनीतिक कदम
इसी परिप्रेक्ष्य में भारत ने अपनी रणनीति स्पष्ट की। उसने अमेरिका के दबाव या जल्दबाजी में कोई समझौता नहीं किया और अपने हितों को सर्वोपरि रखा। यह नीति भारत को एक स्वतंत्र और मजबूती वाली वैश्विक छवि देती है।
भारत-ईयू एफटीए: ट्रंप की नीतियों को झटका
भारत और यूरोपीय संघ के बीच मंगलवार को फाइनल हुआ मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) ट्रंप की नीतियों के लिए चुनौती है। अमेरिकी टैरिफ और धमकियों के कारण भारत और ईयू ने अपनी सप्लाई चेन में विविधता लाने की जरूरत महसूस की। 18 साल से लंबित यह समझौता आखिरकार फाइनल हुआ।
यह समझौता रणनीतिक रूप से बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था को मजबूत करता है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र और ग्लोबल साउथ में भारत-ईयू सहयोग को मजबूती देता है और अप्रत्याशित अमेरिकी नीतियों के खिलाफ सुरक्षा कवच का काम करता है। इससे स्पष्ट है कि भारत अब नए वर्ल्ड ऑर्डर में गेमचेंजर बनकर उभर रहा है, जबकि अमेरिका की वैश्विक ताकत प्रभावित हो रही है।

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