बेमेंट ने बताया कि भारत को विशेष तौर पर निमंत्रण भेजा गया है। G7 देशों का यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ये देश अब तक अपनी आवश्यकताओं के लिए काफी हद तक चीन पर निर्भर रहे हैं। भारत और ऑस्ट्रेलिया जैसे सहयोगी देशों को शामिल कर अमेरिका इस निर्भरता को कम करने की रणनीति बना रहा है।
चीन का रेयर अर्थ पर दबदबा
पश्चिमी देशों की चिंता का मुख्य कारण चीन का रेयर अर्थ एलिमेंट्स और अन्य क्रिटिकल मिनरल्स पर एकतरफा नियंत्रण है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के आंकड़ों के अनुसार, कॉपर, लिथियम, कोबाल्ट, ग्रेफाइट और रेयर अर्थ की रिफाइनिंग में चीन की हिस्सेदारी 47% से 87% तक है।
ये खनिज सिर्फ बैटरियों या नवीकरणीय ऊर्जा के लिए ही नहीं, बल्कि सेमीकंडक्टर और रक्षा उपकरणों के उत्पादन के लिए भी अत्यंत आवश्यक हैं। हाल के वर्षों में चीन ने जापान को रेयर अर्थ और चुम्बकों के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने शुरू किए, जिससे पश्चिमी देशों की चिंताएँ बढ़ गईं। ऐसे में यदि किसी भी समय सप्लाई बाधित हुई, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था और सुरक्षा दोनों प्रभावित हो सकती हैं।
ऑस्ट्रेलिया के साथ गठबंधन
आपको बता दें की पिछले साल अक्टूबर में ऑस्ट्रेलिया ने अमेरिका के साथ एक समझौता किया, जिसमें 8.5 अरब डॉलर की परियोजनाओं के माध्यम से चीन के प्रभुत्व को कम करने का प्रयास किया जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया अपने यहां रणनीतिक रिजर्व तैयार कर रहा है ताकि रेयर अर्थ और लिथियम जैसी महत्वपूर्ण वस्तुओं की आपूर्ति बिना रुकावट जारी रहे। इस पहल में यूरोप, जापान, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर जैसे देश भी रुचि दिखा रहे हैं। इससे चीन पर निर्भरता को खत्म किया जा सकेगा।

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