जेल नहीं, अब जुर्माना होगा प्राथमिक उपाय
सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब श्रम कानूनों के उल्लंघन पर पहले की तरह सीधे जेल भेजने की बजाय, जुर्माने को प्राथमिकता दी जाएगी। यह फैसला निवेश और उद्यमिता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लिया गया है, ताकि उद्योगों को अनावश्यक कानूनी जटिलताओं से न गुजरना पड़े। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि श्रमिकों के अधिकारों से समझौता होगा। सरकार ने स्पष्ट किया है कि श्रमिकों की सुरक्षा और न्यायसंगत वेतन प्रणाली उसकी शीर्ष प्राथमिकता में शामिल है।
आउटसोर्सिंग कंपनियों पर सख्ती
आउटसोर्सिंग के जरिए काम लेने वाली कंपनियों द्वारा श्रमिकों के शोषण पर मुख्यमंत्री ने कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी हालत में श्रमिकों को उनका पूरा वेतन मिलना चाहिए और यदि इसमें कोई बाधा आती है तो अतिरिक्त बोझ सरकार खुद उठाएगी। यह कदम असंगठित क्षेत्र में कार्यरत लाखों श्रमिकों के लिए राहत भरा साबित हो सकता है।
आपराधिक धाराएं भी हटेंगी
बैठक में यह भी तय किया गया कि उत्तर प्रदेश देश का पहला राज्य बनेगा जो उद्योगों से जुड़े 13 राज्य अधिनियमों में से लगभग 99 प्रतिशत आपराधिक प्रावधानों को हटाकर उन्हें गैर-आपराधिक श्रेणी में बदलेगा। इससे उद्योगों पर अनावश्यक कानूनी दबाव कम होगा और वे अधिक स्वतंत्रता के साथ कार्य कर सकेंगे। साथ ही, महिलाओं को कार्यस्थल पर अधिक अवसर देने की बात भी सामने आई। इसके लिए फैक्ट्री लाइसेंस की अवधि बढ़ाने, दुकानों और वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों के नियमों में व्यावहारिक बदलाव करने जैसे सुझावों पर चर्चा हुई।
निरीक्षण प्रणाली में पारदर्शिता
सरकार ने निरीक्षण प्रक्रिया को पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के लिए स्व-सत्यापन (Self-certification) और थर्ड पार्टी ऑडिट की प्रणाली को अपनाने का निर्णय लिया है। इससे छोटे और मध्यम उद्योगों को बार-बार निरीक्षणों की जटिलता से राहत मिलेगी और भ्रष्टाचार की संभावनाएं भी कम होंगी।

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