कोर्ट ने क्या कहा?
हाईकोर्ट की जस्टिस पुर्णेन्दु सिंह की एकल पीठ ने यह स्पष्ट किया कि जिन शिक्षकों ने 12 वर्षों तक संतोषजनक सेवाएं दी हैं और जिन्होंने आवश्यक प्रशिक्षण भी पूरा कर लिया है, उन्हें स्नातक प्रशिक्षित शिक्षक के पद पर प्रमोशन मिलना उनका कानूनी अधिकार है।
तीन महीने में हो पूरी प्रक्रिया
कोर्ट ने सरकार को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि तीन महीने के भीतर वरिष्ठता सूची तैयार कर प्रमोशन की प्रक्रिया पूरी की जाए। यह निर्देश न केवल प्रशासन की जवाबदेही तय करता है, बल्कि शिक्षकों के भविष्य की दिशा भी निर्धारित करता है। यह मामला सीतामढ़ी जिले के 12 शिक्षकों से जुड़ा था, जिनकी नियुक्ति 2003 से 2007 के बीच हुई थी। इन सभी ने आवश्यक प्रशिक्षण भी प्राप्त कर लिया, लेकिन इसके बावजूद उन्हें आज तक पदोन्नति का लाभ नहीं मिला। जब वर्षों की प्रतीक्षा भी निराशा में बदलने लगी, तो उन्होंने न्यायालय की शरण ली।
नियमों की अनदेखी पर कोर्ट सख्त
पटना हाईकोर्ट ने बिहार पंचायत प्रारंभिक शिक्षक सेवा नियमावली 2012 और 2020 का हवाला देते हुए कहा कि समय पर पदोन्नति मिलना शिक्षकों का संवैधानिक और वैधानिक अधिकार है। इस अधिकार से उन्हें वंचित करना न केवल अन्याय है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 16 (समान अवसर) का भी उल्लंघन है।
समान कार्य, समान वेतन की बात दोहराई
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि समान कार्य करने वाले शिक्षकों को वेतनमान में भेदभाव का सामना नहीं करना चाहिए। अलग-अलग वेतनमान न केवल असंवैधानिक है, बल्कि इससे असंतोष भी जन्म लेता है। अब सरकार पर जिम्मेदारी है कि वह सभी योग्य शिक्षकों को समान अवसर और वेतनमान सुनिश्चित करे।

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