अमेरिका से आगे निकल सकता है भारत, चीन से टक्कर

नई दिल्ली। भारत की अर्थव्यवस्था एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां से वह वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में बड़े बदलाव का संकेत दे रही है। क्रय शक्ति समता (PPP) के आधार पर 2030 तक 20.7 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंचने की संभावना जताई जा रही है और 2038 तक अमेरिका को पीछे छोड़ते हुए यह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकती है। यह केवल एक आकांक्षा नहीं, बल्कि ठोस आर्थिक रुझानों और रणनीतिक नीतियों का परिणाम हो सकता है।

वैश्विक व्यापार में चुनौतियाँ

हालांकि, यह यात्रा इतनी आसान नहीं होगी। अमेरिका द्वारा लगाए जाने वाले 50% आयात शुल्क का भारत की अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है। यदि यह शुल्क पूरी तरह लागू होता है, तो भारत की जीडीपी पर लगभग 0.9% तक का नकारात्मक असर पड़ने की संभावना है।

विशेषकर, भारतीय निर्यात के ऐसे क्षेत्र जिनमें वस्त्र, रत्न-आभूषण, झींगा, चमड़ा और यांत्रिक मशीनरी शामिल हैं, अमेरिकी बाजार में महंगे हो जाएंगे, जिससे निर्यात में गिरावट संभव है। लेकिन यदि सरकार सही समय पर उचित नीतिगत उपाय करे जैसे कि वैकल्पिक बाजारों की खोज, निर्यात सब्सिडी या विनिर्माण में प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाना तो इस प्रभाव को 0.1% तक सीमित किया जा सकता है।

अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा और रणनीति

2038 तक अमेरिका को पीछे छोड़ने का लक्ष्य तभी पूरा होगा जब भारत निरंतर औसतन 6.5% की विकास दर बनाए रखे और अमेरिका की विकास दर करीब 2.1% के आसपास बनी रहे। यह अंतर अपने आप में भारत को वर्षों में एक जबरदस्त छलांग दिला सकता है।

भारत को इसके लिए तकनीकी नवाचार, उत्पादन क्षमता में विस्तार, स्वदेशी विनिर्माण को बढ़ावा और वैश्विक सप्लाई चेन में स्थायी भूमिका निभाने की जरूरत है। ‘मेक इन इंडिया’, ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘स्टार्टअप इंडिया’ जैसे कार्यक्रम इसी दिशा में सकारात्मक कदम हैं।

विकसित भारत 2047 की ओर

ईवाई की रिपोर्ट यह संकेत देती है कि भारत यदि अपनी रणनीति को ठोस रूप दे तो न केवल वह आर्थिक रूप से अमेरिका को पीछे छोड़ सकता है, बल्कि सामाजिक और तकनीकी विकास के मामलों में भी वैश्विक नेतृत्व हासिल कर सकता है। भारत की यह संभावित छलांग न केवल आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह वैश्विक शक्ति संतुलन को भी एक नया रूप दे सकती है।

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