अमेरिका का हौव्वा बनाम असली मुनाफा
अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर 50% तक टैरिफ लगाते हुए यह संकेत दिया कि वह भारत की रूस से तेल खरीद पर नाराज़ है। अमेरिकी प्रशासन का आरोप रहा कि भारत यूक्रेन युद्ध का लाभ उठाकर सस्ती ऊर्जा लेकर मुनाफाखोरी कर रहा है। लेकिन ब्रोकरेज फर्म CLSA की हालिया रिपोर्ट ने इन सभी दावों की ज़मीन हिला दी है।
CLSA के मुताबिक, भारत को रूस से सस्ता तेल खरीदने से जितना लाभ बताया गया, असल में वह उससे कहीं कम है। अनुमान था कि भारत को सालाना 10 से 25 अरब डॉलर का लाभ हो सकता है। लेकिन असली आंकड़ा इससे काफी छोटा है, महज 2.5 अरब डॉलर सालाना, यानी भारत की GDP का मात्र 0.06%।
तेल तो सस्ता मिला, पर फायदे ज्यादा नहीं
रूस ने पश्चिमी प्रतिबंधों के चलते अपने तेल पर भारी छूट देना शुरू किया था। भारत ने इस अवसर का इस्तेमाल किया और 2024-25 में अपने कुल तेल आयात का 36% रूस से खरीदा, जो युद्ध से पहले मात्र 1% था। हालांकि, छूट का लाभ अब लगातार कम होता जा रहा है। 2023-24 में भारत को औसतन 8.5 डॉलर प्रति बैरल की छूट मिली थी। लेकिन यह अब घटकर सिर्फ 1.5 डॉलर प्रति बैरल तक आ गई है। ऊपर से, बीमा, जहाजरानी और अन्य लागतें जोड़ने के बाद यह छूट और भी सीमित हो जाती है।
तेल मिलाना पड़ता है, लागत बढ़ जाती है
एक और ज़रूरी तथ्य यह है कि भारतीय रिफाइनरियों को केवल रूसी तेल पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। उन्हें बेहतर गुणवत्ता वाला, महंगा तेल भी मिलाना पड़ता है, ताकि रिफाइनिंग प्रोसेस संतुलित रहे। इससे भी औसत लागत पर असर पड़ता है और लाभ सीमित हो जाता है।
राजनीति बनाम ऊर्जा सुरक्षा
रिपोर्ट साफ़ तौर पर कहती है कि भारत का रूस से तेल खरीदना अब सिर्फ आर्थिक नहीं, रणनीतिक निर्णय भी बन चुका है। अगर भारत यह खरीद अचानक रोक दे, तो अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की सप्लाई घट सकती है, जिससे कीमतें 90-100 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं। इससे सिर्फ भारत ही नहीं, पूरी दुनिया को महंगाई का झटका लगेगा।

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