ब्रिक्स बनाम वाशिंगटन: टकराव की शुरुआत
ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका ये पांच देश मिलकर ब्रिक्स नामक समूह का निर्माण करते हैं। यह समूह अब केवल एक आर्थिक गठबंधन नहीं रह गया है, बल्कि अमेरिकी नीति और दबाव के खिलाफ एकजुट विरोध का प्रतीक बनता जा रहा है। अमेरिका ने हाल ही में भारत और ब्राजील पर भारी टैरिफ लगाए, खासतौर पर इसलिए कि ये देश रूस से तेल खरीद रहे हैं। अमेरिका की विदेश नीति के अनुसार, जो भी देश उसकी लाइन से हटकर चलता है, उसे आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ता है। लेकिन अब ब्रिक्स देश झुकने के बजाय मुकाबले को तैयार हैं।
अमेरिका खो रहा है अपना आर्थिक नियंत्रण
प्रसिद्ध अमेरिकी अर्थशास्त्री जेराल्ड सेलेन्ते का कहना है कि अमेरिका अब वैश्विक आर्थिक ताकत नहीं रह गया है जो वह कभी था। उनका मानना है कि चीन और भारत जैसी अर्थव्यवस्थाएं न केवल विकास कर रही हैं, बल्कि अमेरिका के बनाए नियमों को चुनौती भी दे रही हैं। सेलेन्ते ने एक पॉडकास्ट में कहा कि भारत अब अमेरिकी व्यापार पर निर्भर नहीं है। उसका केवल 2% व्यापार अमेरिका के साथ होता है। बाकी वह खुद से या अपने क्षेत्रीय साझेदारों के साथ कर रहा है। यह आत्मनिर्भरता अमेरिका के लिए बड़ा झटका है, क्योंकि वह हमेशा चाहता रहा है कि बाकी दुनिया उसके आर्थिक आदेशों का पालन करे।
चीन: तकनीक और विनिर्माण में नई महाशक्ति
सेलेन्ते ने इस बात पर ज़ोर दिया कि चीन ने न केवल भारी उद्योग, बल्कि उच्च तकनीक जैसे क्षेत्रों में भी अमेरिका को पछाड़ दिया है। आज दुनिया की सबसे बड़ी इलेक्ट्रिक वाहन कंपनियां चीन से आती हैं। अमेरिका कभी तकनीक का मक्का माना जाता था, लेकिन अब यह स्थिति तेजी से बदल रही है।
भारत: आत्मनिर्भरता की ओर तेज़ी से कदम
भारत भी अब ‘मेक इन इंडिया’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ जैसी योजनाओं के ज़रिए बाहरी दबाव से मुक्त हो रहा है। रूस से तेल खरीदने का निर्णय भी इसी नीति का हिस्सा है। भारत अपनी ज़रूरतों को देखते हुए स्वतंत्र निर्णय ले रहा है, चाहे अमेरिका को यह पसंद आए या नहीं। यह संकेत है कि भारत केवल एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था नहीं है, बल्कि एक परिपक्व राष्ट्र बन चुका है जो वैश्विक मंच पर अपनी शर्तों पर बात कर सकता है।
अमेरिकी वर्चस्व से ऊबी दुनिया
सेलेन्ते की टिप्पणी के अनुसार, अब दुनिया अमेरिका की एकतरफा नीतियों से थक चुकी है। भारत और चीन जैसे देशों की विशाल जनसंख्या और बढ़ती आर्थिक शक्ति ने अमेरिका की 34 करोड़ की आबादी और घटती औद्योगिक क्षमता के मुकाबले कहीं ज्यादा प्रभावशाली स्थिति बना ली है। ब्रिक्स के बढ़ते प्रभाव, अमेरिका की टैरिफ आधारित आक्रामक नीतियों और भारत-चीन जैसे देशों की आत्मनिर्भरता से यह स्पष्ट है कि अमेरिका की बादशाहत अब पहले जैसी नहीं रही।
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