भारत ने लिया बड़ा फैसला, अमेरिका को झटका, चीन खुश!

नई दिल्ली: चालू वित्त वर्ष 2025-26 के अप्रैल से नवंबर के बीच भारत ने चीन के लिए अपने निर्यात में जबरदस्त वृद्धि दर्ज की है। वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, इस अवधि में भारत का चीन के लिए निर्यात 12.22 अरब डॉलर तक पहुँच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 33 प्रतिशत अधिक है। यह वृद्धि पिछले चार वर्षों में सबसे तेज़ और व्यापक रही है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, यह आंकड़ा केवल संख्याओं में बढ़ोतरी नहीं बल्कि द्विपक्षीय व्यापार में संरचनात्मक बदलाव का भी संकेत देता है। चीन अब भारत के लिए एक प्रमुख निर्यात गंतव्य के रूप में उभरकर सामने आया है। अर्थशास्त्री मानते हैं कि इस तरह के निर्यात उछाल से भारत की अंतरराष्ट्रीय व्यापार स्थिति मजबूत होगी और चीन के साथ द्विपक्षीय संबंधों में नए अवसर खुलेंगे।

निर्यात में कृषि, समुद्री और इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों की बढ़त

वाणिज्य मंत्रालय ने बताया कि निर्यात में उछाल मुख्य रूप से तेल-खली (oil meals), समुद्री उत्पाद, मसाले और दूरसंचार उपकरण जैसे उत्पादों की मांग बढ़ने के कारण हुआ। इलेक्ट्रॉनिक खंड में विशेष रूप से पापुलेटेड प्रिंटेड सर्किट बोर्ड का निर्यात 2.39 करोड़ डॉलर से बढ़कर 92.24 करोड़ डॉलर तक पहुँच गया। 

इसके अलावा, फ्लैट पैनल डिस्प्ले माड्यूल और टेलीफोनी के लिए अन्य विद्युत उपकरणों की मांग में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई। कृषि और समुद्री उत्पादों में सूखी मिर्च, ब्लैक टाइगर झींगा, हरी मूंग और वन्नामेई झींगा के निर्यात में भी जबरदस्त उछाल देखा गया। इसके अलावा एल्युमिनियम और परिष्कृत तांबे के ‘बिलेट’ ने भी कुल निर्यात वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

निर्माता और निर्यातक खुश, अमेरिका को झटका

एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इस वृद्धि से स्पष्ट होता है कि भारतीय निर्यातक सिर्फ एक ही क्षेत्र पर निर्भर नहीं हैं। इलेक्ट्रॉनिक सामान, कृषि और धातु क्षेत्रों में निर्यात का फैलाव यह दर्शाता है कि भारत के उत्पाद विविध क्षेत्रों में चीन की मांग पूरी कर रहे हैं। 

निर्यातक भी मानते हैं कि अमेरिका में उच्च शुल्क और टैरिफ के कारण अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा मुश्किल हो रही है। ऐसे में चीन के लिए निर्यात के विस्तार ने भारतीय उद्योग के लिए नए अवसर पैदा किए हैं। अमेरिका के लिए यह संकेत है कि भारत धीरे-धीरे अपनी व्यापार रणनीति में विविधीकरण कर रहा है और केवल अमेरिकी बाजार पर निर्भर नहीं रहना चाहता।

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