क्या है पूरा मामला
यह मामला लोक निर्माण विभाग (PWD) के उन जूनियर इंजीनियरों से जुड़ा है, जिन्हें 1984 से 1989 के बीच डेली वेजेज या वर्कचार्ज आधार पर नियुक्त किया गया था। बाद में इन्हें नियमित किए जाने को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ।
कोर्ट का सख्त रुख
खंडपीठ, जिसमें अरुण भंसाली और जसप्रीत सिंह शामिल थे, ने सुनवाई के दौरान पाया कि सरकार की अपीलें निर्धारित समयसीमा के काफी बाद दाखिल की गई थीं। देरी 90 दिनों से लेकर करीब 200 दिनों तक की थी। सरकार ने फाइलों के मूवमेंट, विभागीय प्रक्रियाओं और अन्य कारणों का हवाला दिया, लेकिन अदालत ने इन्हें उचित नहीं माना। कोर्ट ने साफ कहा कि प्रशासनिक सुस्ती को देरी का आधार नहीं बनाया जा सकता।
कर्मचारियों को क्या मिला फायदा
इस फैसले के बाद संबंधित जूनियर इंजीनियरों को वर्ष 2006 के बजाय 2001 से नियमित माना जाएगा। इसका सीधा असर उनकी सेवा शर्तों पर पड़ेगा और वे पुरानी पेंशन योजना के दायरे में आ जाएंगे।
इनके लिए OPS का रास्ता हुआ साफ
वर्ष 2004 के बाद नई पेंशन प्रणाली लागू होने के कारण कई कर्मचारियों को पुरानी पेंशन का लाभ नहीं मिल पा रहा था। लेकिन इस निर्णय के बाद इन कर्मचारियों के लिए OPS का रास्ता खुल गया है, जिससे उन्हें रिटायरमेंट के बाद बेहतर वित्तीय सुरक्षा मिल सकेगी।
न्यायालय की अहम टिप्पणी से लाभ
कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि यदि सरकारी विभागों की देरी को आसानी से स्वीकार कर लिया जाए, तो इससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होगी और आम लोगों के अधिकारों पर भी असर पड़ेगा। इसलिए समयसीमा का पालन सभी के लिए जरूरी है।

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