चीन-पाकिस्तान की बढ़ी टेंशन! भारत और UAE साथ करेंगे रक्षा उत्पादन

नई दिल्ली। भारत और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने रक्षा क्षेत्र में अपनी साझेदारी को नई ऊंचाई देते हुए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के यूएई दौरे के दौरान हुए इस समझौते को दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग के लिहाज से बड़ा कदम माना जा रहा है।

इस नई साझेदारी के तहत भारत और यूएई अब रक्षा उपकरणों, आधुनिक तकनीक और एडवांस्ड हथियार प्रणालियों के संयुक्त निर्माण पर मिलकर काम करेंगे। इससे दोनों देशों की सैन्य क्षमता और रक्षा उद्योग को बड़ा फायदा मिल सकता है।

क्या है यह नई रक्षा साझेदारी?

भारत और यूएई के बीच हुए इस समझौते को 'रक्षा औद्योगिक सहयोग के लिए रणनीतिक ढांचा' नाम दिया गया है। इसका उद्देश्य सिर्फ हथियार खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं है, बल्कि रक्षा उत्पादन, टेक्नोलॉजी शेयरिंग और संयुक्त विकास को बढ़ावा देना भी है। इसमें सैन्य प्रशिक्षण, संयुक्त अभ्यास, समुद्री सुरक्षा, साइबर रक्षा, सुरक्षित संचार प्रणाली और विशेष अभियानों में सहयोग जैसे कई अहम क्षेत्र शामिल किए गए हैं।

अबू धाबी में हुई अहम बैठक

अबू धाबी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूएई के राष्ट्रपति के बीच हुई द्विपक्षीय बैठक के बाद इस रणनीतिक ढांचे की घोषणा की गई। दोनों देशों ने इस बात पर जोर दिया कि भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए रक्षा क्षेत्र में तकनीकी सहयोग और संयुक्त उत्पादन बेहद जरूरी है।

किन क्षेत्रों में होगा संयुक्त उत्पादन?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार दोनों देश छोटे हथियारों, ड्रोन, मिसाइल सिस्टम, नौसैनिक प्लेटफॉर्म और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित रक्षा तकनीकों पर मिलकर काम कर सकते हैं। इसके अलावा सटीक गोला-बारूद और आधुनिक निगरानी प्रणाली जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ाने की तैयारी है। भारत की रक्षा कंपनी ICOMM और यूएई की CARACAL के बीच छोटे हथियारों के संयुक्त निर्माण को इस दिशा में शुरुआती मॉडल के रूप में देखा जा रहा है।

भारत के रक्षा उद्योग को मिलेगा बड़ा फायदा

पिछले कुछ वर्षों में भारत ने रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में तेजी से प्रगति की है। सरकार 'मेक इन इंडिया' और आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत घरेलू रक्षा उद्योग को मजबूत करने पर लगातार जोर दे रही है। यूएई के निवेश और तकनीकी सहयोग से भारत के रक्षा निर्माण क्षेत्र को नई गति मिलने की उम्मीद है। इससे भारत न केवल अपनी जरूरतें पूरी कर सकेगा, बल्कि रक्षा निर्यात भी बढ़ा सकता है।

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