यूपी में 'किसानों' के लिए अच्छी खबर, पढ़ें डिटेल

लखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार ने किसानों की जमीन से जुड़ी एक बेहद महत्वपूर्ण प्रक्रिया 'चकबंदी' को लेकर बड़ा और दूरगामी फैसला लिया है। इस निर्णय का सीधा लाभ राज्य के लाखों किसानों को मिलेगा, खासकर उन्हें, जो अब तक चकबंदी प्रक्रिया में अपनी राय व्यक्त करने से वंचित थे।

क्या है चकबंदी?

चकबंदी एक प्रशासनिक प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत किसानों की बिखरी हुई, टुकड़ों में बंटी हुई भूमि को एक जगह समेटा जाता है। इसका उद्देश्य खेती को सुविधाजनक बनाना, सिंचाई एवं कृषि यंत्रों के इस्तेमाल को आसान करना और भूमि का समुचित उपयोग सुनिश्चित करना होता है। लेकिन अब तक इस प्रक्रिया को लेकर कई बार किसानों में भ्रम, असहमति और विवाद की स्थिति देखने को मिलती रही है।

पुराने नियमों में क्या था?

पहले चकबंदी की शुरुआत ग्राम प्रधान और ग्राम पंचायत के चुने हुए प्रतिनिधियों के बहुमत वाले प्रस्ताव के आधार पर होती थी। यह प्रक्रिया किसानों की सीधी भागीदारी के बिना भी शुरू हो जाती थी, जिससे कई बार गांवों में असंतोष और कानूनी झंझट खड़े हो जाते थे।

नया क्या बदला गया है?

अब चकबंदी की प्रक्रिया की शुरुआत तभी होगी जब गांव के कम से कम 75 प्रतिशत खाताधारक यानी जमीन रखने वाले किसान अपनी लिखित सहमति देंगे। यह सहमति ग्राम पंचायत के प्रस्ताव के साथ-साथ अनिवार्य कर दी गई है। राज्य सरकार ने इस संबंध में सभी जिलाधिकारियों को स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि वे चकबंदी प्रक्रिया से पहले यह सहमति सुनिश्चित करें।

इस बदलाव की जरूरत क्यों पड़ी?

चकबंदी का मुख्य उद्देश्य किसानों को लाभ पहुंचाना है, लेकिन जब यह प्रक्रिया उनकी सहमति के बिना शुरू होती थी, तो इसका लाभ विवादों और आपसी झगड़ों में उलझकर रह जाता था। कई बार यह देखा गया कि जिन किसानों की भूमि को चकबंदी में शामिल किया गया, उन्हें इसकी जानकारी भी नहीं होती थी। ऐसे में यह बदलाव न सिर्फ न्यायसंगत है, बल्कि यह किसानों को निर्णय की प्रक्रिया में सहभागी बनाता है।

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