बढ़ती शिकायतें और शपथपत्र का सहारा
लखीमपुर जिले की स्थिति इस बात का जीवंत उदाहरण है। जहां पहले महीने भर में एक-दो शिकायतें ही सामने आती थीं, वहीं अब यह संख्या बढ़कर दस तक पहुंच गई है। खास बात यह है कि अब शिकायतें केवल मौखिक या कागजी नहीं, बल्कि शपथपत्र के माध्यम से की जा रही हैं। यह दर्शाता है कि ग्रामीण अब अपने आरोपों को प्रमाणिकता के साथ प्रशासन के समक्ष रखने लगे हैं।
शिकायतों की प्रकृति: विकास या भ्रष्टाचार?
जिन शिकायतों पर जांच की मांग की जा रही है, वे सभी सीधे-सीधे गांव के विकास कार्यों से जुड़ी हैं। इनमें खंड़जा (ईंटों की सड़क), पक्की सड़क निर्माण, प्रधानमंत्री आवास योजना, मनरेगा के तहत मजदूरी भुगतान, हैंडपंप रिबोर, स्ट्रीट लाइट लगाने, और तालाबों के सौंदर्यीकरण जैसे कार्य शामिल हैं। लोगों का आरोप है कि इन कार्यों में भारी गड़बड़ियां हुई हैं। कहीं कार्य अधूरे छोड़ दिए गए, तो कहीं धन का दुरुपयोग हुआ है।
इस संदर्भ में क्या है प्रशासन की प्रतिक्रिया?
जिलाधिकारी ने इस स्थिति को गंभीरता से लेते हुए जांच के लिए एक टीम गठित करने का आदेश दिया है, जिसमें एक जिला स्तरीय अधिकारी और एक तकनीकी अधिकारी शामिल होंगे। इससे प्रशासन की यह मंशा स्पष्ट होती है कि वह शिकायतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहता, खासकर चुनावी समय में जब पारदर्शिता सबसे अहम मुद्दा होती है।
चुनावी समीकरणों में बदलाव का संकेत
इस तरह की शिकायतें सिर्फ प्रशासनिक कार्यवाही की मांग नहीं करतीं, बल्कि चुनावी समीकरणों को भी प्रभावित कर सकती हैं। यदि किसी ग्राम प्रधान पर लगे आरोप साबित होते हैं, तो यह न केवल उसकी छवि को नुकसान पहुंचाएगा, बल्कि अगले चुनाव में जनता की पसंद को भी प्रभावित करेगा। इससे एक संदेश यह भी जाता है कि अब ग्रामीण मतदाता 'विकास' को केवल चुनावी वादे के रूप में नहीं, बल्कि ज़मीनी हकीकत के रूप में देखना चाहते हैं।

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