रूस से तेल की निर्भरता, लेकिन संतुलन जरूरी
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अपनी तेल आयात नीति में बड़े बदलाव किए हैं। पहले भारत मुख्य रूप से मध्य-पूर्वी देशों पर निर्भर था, लेकिन अब रूस भारत का प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ता बन गया है। 2023 तक रूसी तेल का हिस्सा देश की कुल आपूर्ति में 38% से अधिक था। इसी बीच, अमेरिका और अन्य देशों से आयात बढ़ाने की पहल की जा रही है, ताकि वैश्विक भू-राजनीतिक दबाव और कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच संतुलन बना रहे।
अमेरिकी टैरिफ और उसकी चुनौती
अमेरिका की ओर से टैरिफ और प्रतिबंधों के चलते भारत को वैकल्पिक सोर्स की तलाश करनी पड़ रही है। यदि टैरिफ बहुत अधिक बढ़ जाता है, तो तेल महंगा हो जाएगा और देश की आर्थिक वृद्धि और मुद्रास्फीति पर असर पड़ेगा। इस कारण भारत ने अपनी ऊर्जा नीति में विविधता लाने पर जोर दिया है, ताकि राष्ट्रीय जरूरतें पूरी हों और अंतरराष्ट्रीय दबावों का असर न्यूनतम रहे।
सरकार के लिए राष्ट्रीय हित सर्वोपरि
भारत रूस से तेल खरीदना तभी बंद करेगा जब बाजार और राष्ट्रीय हित की जरूरत हो। फरवरी 2022 में यूक्रेन संकट के बाद भारत ने रूस से रियायती कीमतों पर तेल खरीद बढ़ाई थी। अमेरिकी आलोचना के बावजूद भारत का कहना है कि उसके निर्णय केवल राष्ट्रीय जरूरतों और बाज़ार की परिस्थितियों पर आधारित हैं।
वेनेजुएला और अन्य विकल्प
वेनेजुएला और अमेरिका से तेल आयात को लेकर भी भारत अपनी रणनीति में लचीलापन रख रहा है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत की ऊर्जा सोर्सिंग नीति राष्ट्रीय हित और बाज़ार की वास्तविकताओं से निर्देशित है। “हमारी प्राथमिकता 1.4 अरब भारतीयों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना है, और इसके लिए विविध सोर्सिंग हमारी रणनीति का अहम हिस्सा है। सभी कदम इसी सोच के अनुरूप उठाए जा रहे हैं और भविष्य में भी इसी दिशा में उठेंगे।”

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