सदन में उठा मुद्दा, सदन में ही हुआ फैसला
प्रश्नकाल के दौरान बीजेपी विधायक राघवेंद्र प्रताप सिंह ने कर्मचारियों के लिए कैशलेस इलाज की मांग जोरदार तरीके से उठाई। उन्होंने मौजूदा रीइंबर्समेंट व्यवस्था को अव्यावहारिक बताते हुए कहा कि इलाज के बाद महीनों तक पैसा वापस मिलने का इंतजार करना पड़ता है, जिससे कर्मचारियों को आर्थिक परेशानी होती है।
डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी ने पहले इस विषय पर बैठक बुलाने की बात कही, लेकिन विधायक इस पर संतुष्ट नहीं हुए। जाले से बीजेपी विधायक जीवेश मिश्रा ने भी सरकार पर दबाव बनाते हुए कहा कि जब सरकार सदन में मौजूद है, तो फैसले के लिए बैठक की जरूरत क्यों। इस पर माहौल गरम हुआ और अंततः सरकार ने सदन में ही कैशलेस स्वास्थ्य सुविधा देने की घोषणा कर दी।
रीइंबर्समेंट सिस्टम से मिलेगा छुटकारा
अब तक बिहार में सरकारी कर्मचारियों के लिए इलाज की व्यवस्था रीइंबर्समेंट मॉडल पर आधारित थी, जिसमें पहले खर्च कर्मचारी को खुद करना पड़ता था और बाद में बिल जमा कर राशि वापस मिलती थी। कई मामलों में यह प्रक्रिया लंबी और जटिल साबित होती थी। नई कैशलेस व्यवस्था के लागू होने से कर्मचारी और उनके परिवार सीधे सूचीबद्ध अस्पतालों में इलाज करा सकेंगे, जहां भुगतान की जिम्मेदारी सरकार की होगी।
इस व्यवस्था का जल्द होगा अमल
सरकार ने यह भी भरोसा दिलाया है कि इस योजना को जमीन पर उतारने के लिए एक सप्ताह के भीतर बैठक कर विस्तृत रूपरेखा तैयार की जाएगी। इसमें यह तय किया जाएगा कि किन अस्पतालों को शामिल किया जाएगा, इलाज की सीमा क्या होगी और प्रक्रिया कैसे लागू की जाएगी।
कर्मचारियों के लिए राहत का कदम
स्वास्थ्य खर्च को लेकर लंबे समय से चली आ रही शिकायतों के बीच यह फैसला सरकारी कर्मचारियों के लिए बड़ी सौगात माना जा रहा है। अगर योजना को प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है, तो यह बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण सुधार साबित हो सकता है।

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