क्यों जरूरी है योजनाओं का एकीकरण
वर्तमान में कृषि एवं किसान कल्याण विभाग की ये दोनों योजनाएं अलग-अलग ढांचे के तहत संचालित हो रही हैं। इससे कई बार राज्यों को योजना के घटकों के चयन और क्रियान्वयन में सीमाएं महसूस होती हैं। सरकार का मानना है कि यदि इन योजनाओं को एक “अम्ब्रेला स्कीम” के तहत लाया जाए, तो राज्यों को यह सुविधा मिलेगी कि वे अपनी स्थानीय कृषि परिस्थितियों के अनुसार योजना के घटकों को चुन सकें।
16वीं वित्त आयोग अवधि के लिए तैयारी
कृषि मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि यह पहल 16वीं वित्त आयोग की अवधि को ध्यान में रखकर की जा रही है। इसके तहत केंद्रीय कृषि योजनाओं को नए सिरे से डिजाइन किया जाएगा ताकि संसाधनों का बेहतर उपयोग हो और योजनाओं का असर सीधे किसानों तक पहुंचे। इस दिशा में Expenditure Finance Committee (EFC) के तहत एक प्रारंभिक ड्राफ्ट भी तैयार किया गया है। इसे विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों और नीति आयोग (NITI Aayog) के साथ साझा किया गया है ताकि विशेषज्ञ सुझाव और आपत्तियां ली जा सकें।
अंतर-मंत्रालयी परामर्श के बाद अंतिम फैसला
सरकार ने यह भी साफ किया है कि यह प्रस्ताव अभी परामर्श की प्रक्रिया में है। अन्य मंत्रालयों और नीति आयोग से मिले सुझावों के आधार पर ड्राफ्ट में आवश्यक संशोधन किए जा सकते हैं। इसके बाद ही अंतिम प्रस्ताव को मंजूरी दी जाएगी और आगे की संसदीय प्रक्रिया पूरी की जाएगी। यह प्रक्रिया यह सुनिश्चित करती है कि योजना केवल कागज़ी न रह जाए, बल्कि व्यावहारिक और सभी हितधारकों के लिए उपयोगी साबित हो।
नई व्यवस्था में राज्यों को मिलेगी ज्यादा स्वायत्तता
इस प्रस्ताव का सबसे बड़ा लाभ राज्यों को मिलने वाली स्वायत्तता है। एक ही योजना के भीतर विभिन्न गतिविधियों को जोड़ने से राज्य सरकारें अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार निवेश कर सकेंगी। इससे कृषि विकास की योजनाएं ज्यादा वास्तविक जरूरतों पर आधारित होंगी, न कि एक ही ढांचे में सभी पर लागू होने वाली। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि इससे केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग भी मजबूत होगा और योजनाओं के क्रियान्वयन में गति आएगी।

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