दरअसल, हाल के दिनों में केंद्र सरकार के विभिन्न कर्मचारी संगठनों और वेतन आयोग के बीच बैठकों का दौर शुरू हुआ है। इन बैठकों में कर्मचारियों की ओर से कई अहम मांगें रखी जा रही हैं, जिनमें सबसे प्रमुख मांग डीए मर्जर की है।
क्या होता है DA मर्जर?
महंगाई भत्ता सरकारी कर्मचारियों को बढ़ती महंगाई से राहत देने के लिए दिया जाता है। समय-समय पर सरकार इसमें बढ़ोतरी करती रहती है। फिलहाल डीए का प्रतिशत काफी बढ़ चुका है और कर्मचारी संगठन चाहते हैं कि इसे बेसिक सैलरी में जोड़ दिया जाए।
अगर ऐसा होता है तो कर्मचारियों की सिर्फ मूल सैलरी ही नहीं बढ़ेगी, बल्कि उससे जुड़े कई अन्य भत्तों और सुविधाओं में भी बड़ा इजाफा होगा। इनमें मकान किराया भत्ता (HRA), ट्रांसपोर्ट अलाउंस, पेंशन और सालाना इंक्रीमेंट शामिल हैं।
क्यों उठ रही है यह मांग?
कर्मचारी संगठनों का तर्क है कि पिछले कुछ वर्षों में महंगाई तेजी से बढ़ी है। खाने-पीने से लेकर शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास तक हर क्षेत्र में खर्च बढ़ा है। ऐसे में डीए का लगातार बढ़ना यह दिखाता है कि मौजूदा वेतन संरचना अब वास्तविक जरूरतों के अनुरूप नहीं रह गई है।
ऑल इंडिया एनपीएस एम्प्लॉइज फेडरेशन ने अपने ज्ञापन में कहा है कि दिसंबर 2025 तक डीए करीब 58 प्रतिशत तक पहुंच चुका था। संगठन का कहना है कि इतनी ऊंची दर यह साबित करती है कि कर्मचारियों की क्रय शक्ति लगातार कमजोर हुई है।
न्यूनतम वेतन बढ़ाने की भी मांग
कर्मचारी संगठनों ने 7वें वेतन आयोग की कई पुरानी मान्यताओं पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि मौजूदा न्यूनतम बेसिक सैलरी 18 हजार रुपये तीन सदस्यीय परिवार की जरूरतों को ध्यान में रखकर तय की गई थी, जबकि आज के समय में परिवार का आकार और खर्च दोनों बढ़ चुके हैं।
इसी आधार पर संगठनों ने परिवार इकाई को बढ़ाकर पांच करने और उसी हिसाब से न्यूनतम वेतन तय करने का सुझाव दिया है। प्रस्तावित गणना के अनुसार न्यूनतम वेतन 30 हजार रुपये से शुरू होकर डीए जोड़ने के बाद लगभग 47 हजार रुपये तक पहुंच सकता है। कर्मचारी संगठन चाहते हैं कि नई न्यूनतम सैलरी 55 हजार से 60 हजार रुपये के बीच तय की जाए।

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