हाईकोर्ट ने उठाए नियमों पर सवाल
इलाहाबाद हाईकोर्ट की ओर से दिए गए एक आदेश में कहा गया कि ऐसे प्रावधानों के आधार पर ग्राम प्रधानों को प्रशासक की भूमिका देना उचित नहीं है, जिन्हें पहले ही असांविधानिक माना जा चुका है। अदालत ने सरकार को पंचायत चुनाव की प्रक्रिया को लेकर समयसीमा में रूपरेखा पेश करने का निर्देश दिया है। इससे पंचायत चुनाव की तैयारियों को लेकर हलचल बढ़ गई है।
1994 में जोड़ा गया था नया प्रावधान
जानकारी के अनुसार उत्तर प्रदेश पंचायतीराज अधिनियम, 1947 में वर्ष 1994 में बदलाव किया गया था। इसमें धारा 12 में उपधारा 3-ए जोड़ी गई थी। इस प्रावधान के तहत अगर किसी कारण से पंचायत चुनाव समय पर नहीं हो पाते हैं तो ग्राम पंचायत के कामकाज को चलाने के लिए प्रशासक या प्रशासनिक समिति नियुक्त करने की व्यवस्था की गई थी।
2000 में ही हाईकोर्ट ने जताई थी आपत्ति
कानूनी जानकारों के मुताबिक वर्ष 2000 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इसी प्रावधान पर सवाल उठाते हुए इसे असांविधानिक बताया था। अदालत का तर्क था कि संविधान के अनुच्छेद 243 (ई) और 243 (के) के अनुसार पंचायतों का कार्यकाल पांच साल का होता है। इसे किसी भी परिस्थिति में अनिश्चित समय तक बढ़ाया नहीं जा सकता।
सरकार के सामने अब क्या विकल्प?
कानून विशेषज्ञों का कहना है कि इस स्थिति से बचने के लिए सरकार को या तो संबंधित प्रावधान में बदलाव करना चाहिए था या फिर पुराने फैसले के खिलाफ उच्च अदालत में कानूनी रास्ता अपनाना चाहिए था। लेकिन लंबे समय तक इस दिशा में कदम नहीं उठाए जाने के कारण अब पंचायत चुनाव से पहले यह मामला फिर चर्चा में आ गया है।
पंचायत चुनाव 2026 पर बढ़ी नजर
यूपी में पंचायत चुनाव 2026 को लेकर तैयारियां तेज होने वाली हैं। ऐसे में ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने की व्यवस्था पर आए फैसले का असर चुनावी प्रक्रिया और पंचायतों के संचालन पर पड़ सकता है। अब सरकार की ओर से आगे क्या कदम उठाया जाता है, इस पर ग्राम प्रधानों, पंचायत प्रतिनिधियों और ग्रामीण क्षेत्रों की नजर बनी हुई है।

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