कई जिलों में पूरा हुआ सर्वे और अध्ययन
आयोग ने अब तक प्रदेश के कई जिलों का दौरा कर पंचायत व्यवस्था में पिछड़े वर्गों की भागीदारी का अध्ययन किया है। टीम जिला मुख्यालयों पर अधिकारियों के साथ बैठक करने के अलावा ब्लॉक और ग्राम पंचायत स्तर तक पहुंचकर वास्तविक स्थिति का आकलन कर रही है। दौरों के दौरान यह देखा जा रहा है कि पंचायतों में ओबीसी वर्ग का प्रतिनिधित्व कितना है और आरक्षण की आवश्यकता किन क्षेत्रों में अधिक है।
किन आधारों पर तैयार होगी रिपोर्ट?
आयोग केवल आबादी के आंकड़ों पर ही निर्भर नहीं रहेगा, बल्कि कई अन्य पहलुओं का भी विश्लेषण कर रहा है। इनमें प्रमुख रूप से पंचायतों में पिछड़े वर्ग का वर्तमान प्रतिनिधित्व, विभिन्न क्षेत्रों की जनसंख्या का अनुपात, सामाजिक और आर्थिक स्थिति, चुनावों में भागीदारी और प्रतिनिधित्व की वास्तविक स्थिति। इन सभी तथ्यों के आधार पर विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जाएगी।
दिसंबर तक पूरा होगा जिलों का दौरा
आयोग का लक्ष्य प्रदेश के सभी जिलों का भ्रमण कर जमीनी जानकारी जुटाना है। इसके लिए चरणबद्ध तरीके से जिलों का दौरा किया जा रहा है। संभावना है कि दिसंबर तक सर्वे और अध्ययन का कार्य पूरा हो जाएगा, जबकि उसके बाद रिपोर्ट तैयार करने में करीब दो महीने का समय लगेगा। यदि सब कुछ तय कार्यक्रम के अनुसार हुआ तो अंतिम रिपोर्ट अगले वर्ष फरवरी तक सरकार को सौंप दी जाएगी।
पंचायत चुनाव पर पड़ेगा सीधा असर
आयोग की रिपोर्ट के आधार पर पंचायत चुनाव में ओबीसी आरक्षण का स्वरूप तय किया जाएगा। इसलिए यह रिपोर्ट चुनावी प्रक्रिया का एक अहम हिस्सा मानी जा रही है। रिपोर्ट मिलने के बाद सरकार आगे की कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी करेगी, जिसके बाद पंचायत चुनाव की तैयारियां और तेज हो सकती हैं।
पहली बार हुआ ऐसा आयोग गठित
उत्तर प्रदेश में पहली बार पंचायत निकायों में पिछड़े वर्गों के आरक्षण का वैज्ञानिक और विस्तृत अध्ययन कराने के लिए समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया गया है। इसका उद्देश्य आरक्षण व्यवस्था को तथ्यात्मक आधार पर तैयार करना और भविष्य में किसी भी कानूनी विवाद की संभावना को कम करना है।
क्या है आगे की स्थिति?
फिलहाल आयोग का सर्वे और अध्ययन कार्य जारी है। रिपोर्ट सरकार को सौंपे जाने के बाद उसके आधार पर आरक्षण संबंधी अंतिम निर्णय लिया जाएगा। ऐसे में पंचायत चुनाव का इंतजार कर रहे जनप्रतिनिधियों और संभावित उम्मीदवारों की नजर अब आयोग की रिपोर्ट और उसके बाद होने वाले सरकारी फैसलों पर टिकी हुई है।

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