क्या है अमेरिका की नई योजना?
4 फरवरी 2026 को वॉशिंगटन में आयोजित पहले ‘क्रिटिकल मिनरल्स मिनिस्टीरियल’ सम्मेलन में अमेरिका ने यह रणनीतिक प्रस्ताव रखा। इस पहल का मकसद लिथियम, कोबाल्ट, निकेल और रेयर अर्थ एलिमेंट्स जैसे अहम खनिजों की सप्लाई चेन को सुरक्षित और स्थिर बनाना है, वह भी चीन की पकड़ से बाहर।
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने साफ कहा कि अब समय आ गया है जब अमेरिका और उसके सहयोगी देश मिलकर ऐसा ढांचा बनाएं, जहां टैरिफ सुरक्षा हो, न्यूनतम कीमत तय की जाए और मित्र देशों के उत्पादकों को चीनी मूल्य युद्ध से बचाया जाए।
चीन क्यों निशाने पर है?
आज की हकीकत यह है कि चीन दुनिया की करीब 70% रेयर अर्थ माइनिंग और लगभग 90% प्रोसेसिंग क्षमता पर नियंत्रण रखता है। चीन अक्सर कूटनीतिक तनाव के समय इन खनिजों के निर्यात पर रोक लगा देता है या जानबूझकर कीमतें गिराकर दूसरे देशों की खदानों को घाटे का सौदा बना देता है। अमेरिका का मानना है कि यह केवल व्यापार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है।
इस प्रस्तावित ब्लॉक के तहत क्रिटिकल मिनरल्स के लिए बेसलाइन (न्यूनतम) कीमत तय की जाएगी ताकि चीन द्वारा सस्ते दामों पर बाजार बर्बाद करने की रणनीति विफल हो। इसके साथ ही राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 10 अरब डॉलर के सरकारी ऋण और निजी निवेश से एक रणनीतिक भंडार बनाने की घोषणा भी की है, जो इस पूरे नेटवर्क की रीढ़ बनेगा।
भारत कहां खड़ा है?
भारत इस पूरी रणनीति में केवल दर्शक नहीं, बल्कि केंद्रीय खिलाड़ी बनकर उभर रहा है। इस सम्मेलन में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर की सक्रिय मौजूदगी ने साफ संकेत दे दिया कि भारत इस वैश्विक पुनर्संतुलन का अहम हिस्सा है।
भारत में लिथियम, कॉपर और अन्य क्रिटिकल मिनरल्स के बड़े भंडार मिलने लगे हैं। इस ट्रेडिंग ब्लॉक के जरिए भारत को अमेरिकी तकनीक, निवेश और प्रोसेसिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर का सीधा लाभ मिल सकता है। इससे भारत को अपनी EV नीति, सेमीकंडक्टर मिशन और रक्षा उत्पादन के लिए चीन पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

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