वर्षों पुरानी योजना अब निर्णायक दौर में
राज्य में भूमि रिकॉर्ड को व्यवस्थित करने की यह प्रक्रिया एक दशक से अधिक पुरानी है। इसकी शुरुआत 2011 में हुई थी, जिसका मकसद जमीन के स्वामित्व को स्पष्ट करना और बार-बार सामने आने वाले विवादों पर रोक लगाना था। अब सरकार इस काम को अंतिम रूप देने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रही है, ताकि लोगों को अपने जमीन के अधिकार को लेकर भटकना न पड़े।
आम लोगों को मिलेगा सुरक्षा का भरोसा
सरकार ने यह भी साफ किया है कि सर्वे की पूरी प्रक्रिया निगरानी और जवाबदेही के दायरे में रहेगी। यदि किसी व्यक्ति को सर्वे के दौरान त्रुटि या अनियमितता नजर आती है, तो वह संबंधित विभाग में शिकायत दर्ज करा सकता है। ऐसे मामलों पर कार्रवाई करने और जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब लेने के निर्देश दिए गए हैं। सरकार का दावा है कि सर्वे का उद्देश्य समाधान देना है, न कि नए विवाद खड़े करना।
आंकड़े बता रहे हैं काम की प्रगति
सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, पहले चरण में शामिल जिलों में सर्वे से जुड़ा अधिकांश कार्य लगभग पूरा हो चुका है और कई गांवों में नए अधिकार अभिलेख जारी किए जा चुके हैं। दूसरे चरण में राज्य के शेष जिलों में तकनीक की मदद से सर्वेक्षण और ग्राम स्तरीय प्रक्रियाएं पूरी की जा रही हैं। इस चरण में बड़ी संख्या में भूमि स्वामियों से घोषणाएं प्राप्त हुई हैं, जिन्हें रिकॉर्ड से जोड़ा जा रहा है।
जमीन विवादों पर लग सकता है विराम
राजस्व विभाग का मानना है कि सर्वे पूरा होने के बाद जमीन से जुड़े मामलों में पारदर्शिता आएगी। इससे फर्जी दस्तावेजों, लंबे मुकदमों और मालिकाना हक को लेकर चल रही उलझनों में कमी आने की उम्मीद है। सरकार का कहना है कि एक बार रिकॉर्ड दुरुस्त हो जाने के बाद आम लोगों को प्रशासनिक दफ्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे।

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