दरभंगा का सवाल बना पूरे राज्य के लिए निर्देश
यह मुद्दा तब सामने आया जब दरभंगा के जिलाधिकारी ने मुख्यमंत्री की समृद्धि यात्रा और उपमुख्यमंत्री के जन कल्याण संवाद में सवाल उठाया कि एक ही भूमि पर कैडस्ट्रल सर्वे और रिविजनल सर्वे के अलग-अलग अभिलेख होने की स्थिति में किसे अंतिम माना जाए। इसके बाद 3 फरवरी को विभाग ने सभी जिलों के समाहर्ताओं को विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए।
दावा करने वालों को ठोस सबूत देना होगा
सरकार ने निर्देश दिया है कि कोई भी व्यक्ति यदि सरकारी भूमि पर मालिकाना हक का दावा करता है, तो उसे वैध रूप से भूमि का हस्तांतरण प्रमाणित करना होगा। बिना समाहर्ता आदेश और दस्तावेजों के दावे को अस्वीकार किया जाएगा। इसके अलावा, यदि कोई व्यक्ति सरकारी भूमि पर 30 वर्ष या उससे अधिक समय से अवैध कब्जा किए हुए है, तब भी अंचल अधिकारी नोटिस जारी करेंगे और भूमि की सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे। यह प्रक्रिया तब तक जारी रहेगी, जब तक कि सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय से कोई विपरीत आदेश लागू न हो।
कैडस्ट्रल सर्वे को माना जाएगा मूल प्रमाण
राजस्व विभाग ने स्पष्ट किया कि 1890 से 1920 के बीच हुए कैडस्ट्रल सर्वे को बिहार का मूल और प्राथमिक भूमि प्रमाण माना जाएगा। इसमें सरकारी भूमि, सैरात और गैरमजरूआ भूमि जैसी श्रेणियां स्पष्ट रूप से दर्ज हैं। यदि किसी भूमि का नाम रिविजनल सर्वे में किसी निजी व्यक्ति के नाम दर्ज है, तब भी वह स्वतः निजी भूमि नहीं मानी जाएगी। केवल समाहर्ता द्वारा विधिवत आदेश के बाद ही भूमि का बंदोबस्त किसी व्यक्ति के नाम किया जा सकेगा।
भूमि विवादों और सुरक्षा पर असर
इस फैसले को बिहार में सरकारी जमीन की सुरक्षा मजबूत करने और भूमि माफियाओं पर लगाम कसने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। सरकारी अभिलेखों के स्पष्ट आधार पर भूमि के मालिकाना हक को सत्यापित करने से हजारों पुराने और नए भूमि विवादों में पारदर्शिता आएगी और अतिक्रमण की घटनाओं पर काबू पाया जा सकेगा।

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