भारत को क्यों चाहिए राफेल का सोर्स कोड?
अब तक भारत को फ्रांस से 36 राफेल जेट मिल चुके हैं, जिन पर कुछ तकनीकी प्रतिबंध हैं। भारतीय वायु सेना 36 विमानों की वर्तमान क्षमताओं को स्वीकार कर चुकी है। लेकिन यदि 114 और राफेल जेट बेड़े में शामिल किए जाते हैं, तो उनका संचालन और सुधार करने के लिए सोर्स कोड की पहुंच बेहद जरूरी होगी।
भारत लगातार अपनी वायु सेना की तकनीक को उन्नत बनाने और स्वदेशी हथियारों को इंटीग्रेट करने की दिशा में काम कर रहा है। फ्रांस का यह इनकार इस कोशिश को चुनौती दे रहा है और भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता पर असर डाल सकता है।
फ्रांस का रुख और इसके असर
फ्रांस ने राफेल जेट के मुख्य इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध सूट को नियंत्रित करने वाला सोर्स कोड देने से मना किया है। इसके परिणामस्वरूप भारत राफेल जेट को मॉडिफाई, अपग्रेड या स्वदेशी हथियारों के साथ इंटीग्रेट नहीं कर पाएगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला भारत के लिए लंबी अवधि में ऑपरेशनल स्वतंत्रता को सीमित कर सकता है। राफेल जेट के बेड़े का विस्तार तो होना है, लेकिन तकनीकी नियंत्रण पर फ्रांस का सख्त रुख भारत के विकल्पों को कम करता है।
रूस का आकर्षक ऑफर
इसी बीच रूस ने भारत को एक लुभावना प्रस्ताव पेश किया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक रूस भारत को Su-57 पांचवीं पीढ़ी के जेट के सोर्स कोड तक पूरी पहुंच देने का ऑफर दिया है। इस ऑफर के तहत भारत Su-57 को अपनी जरूरतों के अनुसार कस्टमाइज कर सकता है और स्वदेशी तकनीक को इसमें इंटीग्रेट कर सकता है।
यह कदम भारत के लिए ऑपरेशनल ऑटोनॉमी और तकनीक साझा करने का बड़ा अवसर है। Su-57 की लाइसेंस प्रोडक्शन डील पर बातचीत पहले से ही एडवांस स्टेज में है। इसके अलावा, भारत में AMCA पांचवीं पीढ़ी का फाइटर प्रोग्राम अभी विकसित हो रहा है और इसमें देरी के कारण Su-57 विकल्प और आकर्षक बन गया है।
रणनीतिक मायने
फ्रांस का तकनीक पर सख्त रुख और रूस का लुभावना ऑफर भारत की हवा में श्रेष्ठता और रणनीतिक विकल्पों पर असर डाल सकते हैं। भारत अपनी वायु सेना के लिए राफेल चाहता है, लेकिन तकनीकी स्वतंत्रता सुनिश्चित करने की दिशा में रूस के प्रस्ताव में अधिक अवसर नज़र आ रहे हैं।
इस स्थिति से यह स्पष्ट होता है कि भारत को अपने वायु रक्षा बेड़े के लिए सिर्फ विमानों की संख्या ही नहीं, बल्कि तकनीकी नियंत्रण और स्वदेशी इंटीग्रेशन भी ध्यान में रखना होगा।

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