अब हर जिले में अलग से भूमि वर्गीकरण पंजी तैयार की जाएगी। इसमें जमीन की स्थिति और उपयोग के आधार पर उसकी श्रेणी तय की जाएगी। इसके लिए अंचल स्तर पर सर्वे कराया जाएगा और उसी के आधार पर जमीन का रिकॉर्ड अपडेट किया जाएगा।
हर तीन साल में होगी जमीन की समीक्षा
सरकार ने व्यवस्था बनाई है कि भूमि वर्गीकरण पंजी की समय-समय पर जांच की जाएगी। हर तीन साल में यह देखा जाएगा कि किसी क्षेत्र में विकास के कारण जमीन की स्थिति बदली है या नहीं। अगर किसी इलाके की जमीन का स्वरूप बदलता है तो उसकी श्रेणी में भी संशोधन किया जाएगा। वहीं पटना मेट्रोपोलिटन क्षेत्र में तेजी से हो रहे विकास को देखते हुए हर साल समीक्षा करने का फैसला लिया गया है।
जमीन की चार कैटेगरी में होगी पहचान
राज्य में जमीन को मुख्य रूप से चार क्षेत्रों के आधार पर बांटा जाएगा: शहरी क्षेत्र, ग्रामीण क्षेत्र, मेट्रोपोलिटन क्षेत्र, शहर से जुड़े पेरिफेरल क्षेत्र। इस वर्गीकरण से जमीन की कीमत और सर्किल रेट तय करने में भी मदद मिलेगी।
गांव और शहर की जमीन के लिए अलग नियम
ग्रामीण क्षेत्रों में जमीन को सात अलग-अलग श्रेणियों में बांटा जाएगा। इसमें व्यावसायिक, औद्योगिक, आवासीय, सड़क किनारे की जमीन, सिंचित, असिंचित और दियारा-पथरीली जैसी भूमि शामिल होंगी। वहीं शहरी क्षेत्रों में जमीन की छह श्रेणियां तय की गई हैं। इसमें मुख्य सड़क, व्यावसायिक, आवासीय, औद्योगिक और कृषि से जुड़ी जमीन को अलग-अलग रखा जाएगा।
शहर के आसपास की जमीन का भी होगा अलग हिसाब
पेरिफेरल यानी शहर से लगे इलाकों की जमीन के लिए अलग व्यवस्था होगी। यहां जमीन का सर्किल रेट गांव की तुलना में अधिक लेकिन शहर की जमीन से कम रखा जाएगा। इसके लिए जिला स्तर की मूल्यांकन समिति दरों का निर्धारण करेगी। इससे शहरों के विस्तार वाले क्षेत्रों में जमीन की कीमत तय करने में आसानी होगी।
सरकार की इस नई व्यवस्था से जमीन मालिकों को क्यों होगा फायदा?
नई व्यवस्था से जमीन की पहचान और रिकॉर्ड में स्पष्टता आएगी। इससे जमीन खरीदने और बेचने वालों को सही जानकारी मिल सकेगी। साथ ही रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ेगी और गलत वर्गीकरण की समस्या कम होने की उम्मीद है। सरकार का लक्ष्य है कि जमीन से जुड़े मामलों में व्यवस्था को आसान बनाया जाए और भविष्य में होने वाले विवादों को कम किया जा सके।

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